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केले की खेती कर आत्मनिर्भर हो रहे किसान

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उझानी के एक खेत में लहलहाती केले की फसल। संवाद - फोटो : BADAUN
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उझानी/बदायूं। परंपरागत खेती में हो रहा नुकसान सामान्य काश्तकार भले ही झेल लें पर नई पीढ़ी के किसानों की सोच कुछ हटकर है। पढ़े लिखे संपन्न किसान लीक से हटकर खेती करने में विश्वास करते हैं। केले की खेती भी इनमें शामिल है। कम लागत में यह अधिक मुनाफे का जरिया बन रही है। यही नहीं इंजीनियरिंग कर चुके युवा व सरकारी नौकरपेशा लोग भी केले की फसल से आमदनी बढ़ाकर दूसरे किसानों के लिए मिसाल साबित हो रहे हैं।
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केले की खेती के रूप में करीब छह-सात साल पहले नगर निवासी प्रगतिशील किसान आर्येंद्र यादव के बेटे ध्रुव यादव ने शुरुआत की। इन दिनों उनके करीब सौ बीघा रकबे में केले की फसल है। इसी प्रकार ठेकेदार संजीव शर्मा उर्फ चीनू 25 बीघा, पालिका सदस्य ओमप्रकाश अदलक्खा 20 बीघा, कुलदीप साहू 18 बीघा खेत में केले की खेती कर रहे हैं। यही नहीं, व्यापारी परिवार के सदस्य रोबिन छाबड़ा, संतोष कुमार ने भी केले की खेती शुरू की है। यही नहीं बिसौली, सहसवान और बिल्सी क्षेत्र में भी काफी रकबे में केले की खेती देखी जा सकती है।
वैज्ञानिक जानकारी के मुताबिक- केले के पौधे 15 जून से 15 जुलाई के बीच रोपे जा सकते हैं। करीब 14 महीनों में पक कर तैयार हो जाते हैं। प्रति बीघा लागत करीब 15 हजार रुपया आती है लेकिन फसल से मुनाफा 70 हजार रुपये तक हासिल किया जा सकता है। इंटर क्रॉप फसल के रूप में केले की फसल में शिमला मिर्च की भी खेती कर आमदनी को कई गुना अधिक किया जा सकता है।
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दिल्ली और पंजाब में बदायूं के केले की मांग
उझानी। केला उत्पादक बताते हैं कि सब्जी और फल के रूप में जिले में भी केले की काफी खपत है। पड़ोसी जिले संभल, बरेली और पीलीभीत के लिए भी केला जाता है। बाद में संभल की मंडी से केला पंजाब और दिल्ली भेजा जाता है। मिठास और अच्छी गुणवत्ता की वजह से दिल्ली वालों को बदायूं का केला काफी पसंद है।
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इंजीनियर ध्रुव यादव ने बढ़ाया शिक्षक परिवार का मान
प्रगतिशील किसानों की फेहरिस्त में शामिल होने से पहले अहीर टोला मोहल्ले के ध्रुव यादव ने बीटेक का डिप्लोमा हासिल कर लिया था। बाबा जयसिंह यादव एमजीपी कॉलेज से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। पिता आर्येंद्र का निजी बीज भंडार है तो मां शिक्षिका हैं। फिर भी ध्रुव ने परंपरागत खेती की वजाय नए तौर-तरीके अपनाए। उनके परिवार के पास कृषि योग्य जमीन की कोई कमी नहीं है। बकौल ध्रुव- पहली बार केले की खेती की तो अटपटा जरूर लगा लेकिन बाद में उनके कदम बढ़ते गए। वह उन लोगों के लिए केले के पौधे मुहैया कराने से पीछे नहीं हटते जो केले की खेती करना चाहते हैं।
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केले की खेती से संजीव को होने लगी अतिरिक्त आमदनी
नझियाई मोहल्ला निवासी ठेकेदार संजीव शर्मा उर्फ चीनू के पिता भगवान दास शर्मा संपन्न किसानों में शामिल रहे हैं। रसूखदार परिवार से जुड़े चीनू गल्ला व्यापार में भी जुड़े हैं। तीन साल पहले उन्होंने 10 बीघा खेत में केले की खेती की। इस बार रकबा दोगुना करके भी वह संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि केले की खेती से उन्होंने अतिरिक्त आमदनी का रास्ता खोज लिया है। फसल पर अन्य सब्जियों के मुकाबले लागत भी कोई खास नहीं है।
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संतोष बेसिक शिक्षा विभाग में कर्मचारी फिर भी केले की खेती पर जोर
मिल कंपाउंड निवासी संतोष कुमार बेसिक शिक्षा विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। पिछले साल उन्होंने इलाके में कुछ लोगों को केले की खेती करते देखा तो खुद को रोक नहीं पाए। एक व्यापारी परिवार से खेत बंटाई पर लेकर केले के पौधे लगा दिए। उनके खेत में फसल लहलहा रही है। संतोष कहते हैं कि उम्मीद है कि केले की बंपर पैदावार होगी। फसल में कीट लगने का खतरा नहीं है। पहले की तरह ही दाम ठीकठाक मिले तो आमदनी में इजाफा होगा। अगली बार फिर से केले की खेती करेंगे।
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इलाके में केले की खेती के प्रति किसानों में तेजी से रुझान बढ़ा है। हालांकि इसका रकबा उम्मीद से काफी कम है लेकिन आने वाले दिनों में रकबे में इजाफा होने की उम्मीद है। केले की फसल के साथ दूसरी फसल भी हासिल की जा सकती है। अच्छी बात तो यह भी है कि जिन दिनों में केला कटता है, तब आलू की बुआई के दिन होते हैं। ऐसे में खेत खाली नहीं रहता।
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- डॉ. संजय कुमार, कृषि वैज्ञानिक
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