बदायूं। पंचायत चुनाव के लिए सोमवार को मतदान निपटने के बाद अब प्रत्याशी और उनके समर्थक हार-जीत का गुणा-भाग लगाने में जुटे हैं। मंगलवार को प्रत्याशी और उनके समर्थक मतदाता सूची लेकर एक-एक वोट का हिसाब लगाते लगे। हालांकि, दो मई को मतणगना के बाद साफ होगा कि किसके खाते में जीत और किसके हाथ शिकस्त आई।
दरअसल, पंचायत चुनाव में आधे से अधिक मतदाता खुलकर सामने नहीं आते हैं। प्रधानी में तो ज्यादातर लोग ऐसा ही करते हैं, जिसके चलते प्रत्याशी मतदाताओं का रुख नहीं भांप पाते। हालांकि, प्रत्याशी रैली और जनसंपर्क के दौरान बहुतों को खोलने का प्रयास करते हैं, लेकिन गांव की राजनीति होने के कारण ज्यादातर मतदाता खुलकर सामने न आने के स्थान पर चुपचाप वोट देने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। वे किसी से बुराई-भलाई लेना नहीं चाहते।
सोमवार को जिले के15 ब्लॉक की 1037 ग्राम पंचायतों में 73.52 फीसदी मतदाताओं ने मतदान किया। प्रत्याशी मतदान के बाद अब मतदान के फीसदी और मतदाता सूची के हिसाब से वोटों का मिलान कर हार-जीत का गणित लगा रहे हैं। ज्यादातर प्रत्याशी अपनी जीत को पक्का मान रहे हैं, लेकिन ग्राम प्रधान और जिला पंचायत सदस्य पदों को लेकर ज्यादा गुणा-भाग लगाया जा रहा है।
कोई प्रत्याशी अपनी सेटिंग के बल पर जीत का दावा कर रहा था तो कोई व्यवहार की बदौलत। कई ग्राम पंचायतों में तो मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए प्रत्याशियों ने शराब, मुर्गा परोसने के साथ मिठाई भी बांटीं। अन्य तरह के प्रलोभन भी दिए। जिन मतदाताओं ने किसी प्रत्याशी का खुल कर समर्थन किया वह अपने प्रत्याशी की ही जीत का दावा कर रहे हैं। वहीं जो मतदाता चुनाव प्रचार के दौरान किसी के समर्थन में खुलकर सामने नहीं आए वे प्रत्याशी का बिना नाम लिए जीत-हार पर चर्चा कर रहे हैं।
जाति-बिरादरी और संबंधों को भी बता रहे आधार
पंचायत चुनाव में भी जाति-बिरादरी का समीकरण हावी होने लगा है। इसी के कारण प्रचार के दौरान प्रत्याशियों ने अपनी जाति-बिरादरी के वोट बैंक को बंटने से रोकने के लिए सभी जतन किए। संबंधों और नाते-रिश्तेदारी का भी हवाला दिया। अब मतदान के बाद कोई प्रत्याशी जाति के हिसाब से गणित लगाता तो कोई संबंधों पर वोट मिलने की बात कह रहा है। चर्चा के बीच कई बार बहस की नौबत भी आती है। वहीं कुछ लोग बिना बहस के अपनी बात समझा रहे हैं।