पिछले चार सालों से लगातार घाटा झेल रहे किसानों का खेती से तो वैसे ही मोहभंग चल रहा है। इधर, सूखे की आहट से किसानों के हौसले बिल्कुल ही पस्त हो गए हैं। हाल ये है कि पेशगी (किराए) पर खेती करने वाले ढूंढे नहीं मिल रहे हैं। छोटे किसान और बटाई पर खेती करने वाले दूसरे प्रांतों पर मजदूरी करने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
क्षेत्र में मुख्य रूप से गेहूं, धान, मेंथा और आलू की फसल पर किसान निर्भर रहता है, लेकिन अतिवृष्टि, रेट न मिलने और उपज कम होने की वजह से किसान को लगातार फसल में घाटा हो रहा है। पिछले साल इन चारों फसलों ने किसान की कमर ही तोड़ दी। मेंथा का मूल्य कम रहा। धान की उपज कम होने के साथ रेट भी काफी कम रहा और आलू की पैदावार तो बंपर हुई, लेकिन खरीदार ढूंढे नहीं मिले, कोल्ड स्टोर्स में भी जगह नहीं रही। मूल्य भी काफी कम रहा, तो मजदूरी न निकलने के कारण अनेक किसानों ने तो आलू की खोदाई ही नहीं कराई। कई सालों से मेंथा में लगातार घाटा उठाने की वजह से इस बार किसान ने मेंथा की जगह गेहूं को ज्यादा तरजीह दी। अन्य सालों के मुकाबले इस बार गेहूं का रकबा ढाई गुना अधिक रहा। शुरूआत में गेहूं की फसल के उठान को देखते हुए किसानों ने लागत में भी कोई कोताही नहीं बरती। खाद, पानी जमकर लगाया, लेकिन अतिवृष्टि ने गेहूं की फसल की नष्ट कर दी। रही सहीं कसर गेहूं की बिकवाली में पूरी हो गई। शासन-प्रसाशन भले ही दावे कितने ही करे, लेकिन किसी किसान को समर्थन मूल्य नहीं मिला। उसका तो 1300 रुपये क्विंटल में ही गेहूं बिक गया। जबकि समर्थन मूल्य 1450 था। फसल के नुकसान का मुआवजा भी जमीन के मालिकों को मिला। जबकि साठ फीसदी से ज्यादा जमीन पेशगी पर होती है। इसमें फसल की लागत पेशगी पर लेने वाला ही लगाता है। उसे कोई पैसा नहीं मिला।
मामला विधानसभा में उठाएंगे: सिनोद
क्षेत्र के बसपा विधायक सिनोद कुमार शाक्य का कहना है कि पूरी देश की अर्थव्यवस्था किसानों पर आधारित है, यूपी के किसान के आगे भीख मांगने की नौबत है, लेकिन केंद्र और प्रदेश कोई सरकार इस मामले में गंभीर नहीं है। किसान बेहाल हैं। किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। ये सिलसिला जारी है। शासन दावा कर रहा है कि 18 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से दिया जा रहा है, लेकिन किसी भी किसान को 18 हजार के हिसाब ने नहीं मिला है। पिछले साल सूखे का पैसा भी प्रदेश सरकार ने नहीं बांटा। गेहूं की खरीद में जमकर धांधली हुई। ये मामला हम विधानसभा में भी उठाएंगे। किसान अन्य प्रांतों में मजदूरी के भाग रहा है। उसका पलायन रोकने को सब कर्जा माफ हो, डीजल, बीज और अन्य कृषि उपकरणों पर सब्सिडी दी जाए।