दर्शनों से होता है कष्टों का निवारण
कस्बे से दो किलोमीटर दूर आंवला मार्ग पर ऊंचे टीले पर अति प्राचीन मां वरदानी राज राजेश्वरी मंगला माता का शैल शिखर है। पौराणिक गाथाओं में इनकी अनेक गाथाएं शामिल हैं। लोगों की ऐसी आस्था है कि मां के दर्शन मात्र से विभिन्न कष्टों एवं संकटों से छुटकारा मिल जाता है। इनके दरबार से कोई निराश नहीं लौटता, सबकी मनोकामना मातारानी के आशीर्वाद से पूरी हो जाती हैं। यहां लगे मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु जमा हो रहे हैं।
मां की आराधना के लिए वैसे तो प्रतिदिन भक्तगणों का तांता लगा रहता है, मगर चैत्र मास में नवरात्र का समय सर्वश्रेष्ठ माना गया है। चैत्रमास की नवरात्र के बाद पूर्णिमा तक श्रद्धालु परिवार सहित मां की जात करते हैं। अपने बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराते हैं। पूर्णिमा से देवी मां के विशाल मेले का आयोजन होता चला आ रहा है ।
गौरवमयी इतिहास समेटे हैं मां मंगला देवी
मां के मंदिर का इतिहास भी सैकड़ों वर्ष पुराना है। जिस टीले पर मां का मंदिर है। पूर्व में यहां मई भवानीगंज नाम की रियासत थी, किसी राजा ने आक्रमण करके रियासत को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था। समयांतराल में वहां ऊंचा टीला बन गया। मगर, आश्चर्य रूप से वहां देवी मां की प्रतिमा का उदगम हो गया। मां मंगला देवी का चमत्कार मान लोगों ने वहां एक मंदिर स्थापित कर दिया जहां पूजा अर्चना की जाने लगी। मंदिर में एक घायल राजा द्वारा शरण लेने और उसका खोया राजपाठ मिलने पर उस राजा ने मां के मंदिर का पुनरुद्धार कराया। उसी ने चैत्र की पूर्णिमा से मेले के आयोजन की नींव रखी। किवदंती है कि महोबा काल में योद्धा मलखान को इसी मंदिर पर बलि देने के लिए लाया गया था। मंदिर के आले, ताक में आल्हा छिपा बैठा था। उसने दुश्मनों को मारकर मलखान की जान बचाई। इसका प्रमाण महोबा काल के ग्रंथों में भी मिलता है। यह बात भी प्रचलित है कि मलखान ने मुक्त होने के बाद मंदिर का काया कल्प कराकर मेले की परंपरा शुरू की थी।
मंदि र और मेला को लेकर जनश्रुतियों में भिन्नता भले ही हो लेकिन देवी मां के प्रताप की गाथाएं आज भी यथार्थ हैं। श्रद्धालु जब अपनी आस्था के फूल लेकर माता के मंदिर की यात्रा करते हैं तो सर्पाकार सड़क पर टीले पर चढ़ाई करते वक्त मां की जय-जयकार स्वयं निकलने लगती है।
तीन देवियों की शक्तियां समेटे हैं मां मंगला
आश्चर्य रूप से उद्गम हुई मां की प्रतिमा में तीन देवियों का प्रतिरूप है। निश्चित रूप से ये तीनों देवियां शक्ति का प्रतीक मां काली, धन का प्रतीक मां लक्ष्मी, बुद्धि एवं ज्ञान की प्रतीक मां सरस्वती के रूप ही हैं। देवी की प्रतिमा में छोटे-बड़े अनेक आकर हैं, जो देखने में अलग-अलग हैं। मगर, आज तक कोई भी भक्त इनकी सही गिनती नहीं कर सका है। मंदिर के सामने भोले नाथ का और बायीं ओर पवन पुत्र हनुमान का मंदिर है। मां के दाहिनी ओर बाला जी महाराज का मंदिर है। जिसका निर्माण पिछले कुछ वर्षों में ही कराया गया। टीले के नीचे बरी वाले बाबा की समाधि है। कहते हैं की जब तक भक्त बरी वाले बाबा की समाधि पर नहीं जाते, पूजा पूर्ण नहीं होती है।