दिव्यांग दिवाकर शर्मा कई साल से मृतक आश्रित के तौर पर नौकरी के लिए बीएसए दफ्तर पर निरंतर चक्कर काट रहा था। दिव्यांग होते हुए भी उसने अपने प्रयासों में कमी नहीं छोड़ी। विभागीय अधिकारियों से गुहार लगाई। जब उनसे भी न्याय नहीं मिला तो उसने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का दरवाजा खटखटाया। आयोग ने अधिकारियों को उसकी लिपिक पद पर नियुक्ति करने का आदेश दिया, फिर भी उसे कोई लाभ नहीं मिला। वह इस बात से ज्यादा खफा था कि उसके स्थान पर बाद में दूसरे व्यक्ति को मृतक आश्रित पर लिपिक के पद पर नियुक्ति दे दी गई। जबकि अधिकारी उसे लगातार गुमराह करते रहे तब उसने परिवार के साथ आत्मदाह का निर्णय लिया। पुलिस हिरासत में जाने से पहले दिव्यांग दिवाकर शर्मा ने बताया कि तत्कालीन बीएसए ने उसके साथ न्याय नहीं किया। पिता के निधन के बाद उसने पहले शिक्षक के पद पर नौकरी मांगी थी। शिक्षक के पद पर नियुक्ति नहीं मिलने के पीछे विभाग ने तर्क दिया कि 12 जून 2012 को शिक्षक पद पर टीईटी उत्तीर्ण होने का शासनादेश जारी हुआ है। तब उसने मजबूरन 6 अक्तूबर 2012 को लिपिक पद के लिए आवेदन किया लेकिन उसे तत्कालीन बीएसए ने नियुक्ति नहीं दी। दिवाकर का आरोप था कि तत्कालीन बीएसए ने उसका आर्थिक और मानसिक उत्पीड़न किया।
बोला-लिपिक पद पर नियुक्ति न देकर 17 जनवरी 2013 को ऋषिप्रकाश मृतक आश्रित के तौर पर लिपिक पद पर नियुक्ति दे दी,जबकि ऋषिप्रकाश की मां की मृत्यु उसके पिता की मृत्यु के लगभग एक वर्ष बाद हुई। दिवाकर शर्मा का कहना था कि वह सामान्य वर्ग के व्यक्ति थे और नियुक्ति के समय उनकी योग्यता इंटरमीडिएट थी। जबकि उसकी शैक्षिक योग्यता स्नातक थी। साथ ही वह पिछड़ा वर्ग का होने के साथ दिव्यांग भी था। इसके साथ ही उसका आवेदन ऋषिप्रकाश के आवेदन से पहले का था।
दिवाकर ने बताया कि उसने मामले की शिकायत शासन स्तर पर की तब प्रमुख सचिव ने 31 मार्च तक उसे मृतक आश्रित के तौर पर हर हाल में नियुक्ति देने का आदेश जारी किया। तब तत्कालीन बीएसए ने बिना आवेदन के ही उसे 13 फरवरी 2013 को चतुर्थ श्रेणी का नियुक्ति पत्र जारी कर दिया जबकि इस पद को उसने कोई आवेदन नहीं किया। चतुर्थ श्रेणी के पद को आठवीं पास होना जरूरी है। बोला-चार सितंबर 2000 के शासनादेश में प्रस्तर पांच में उल्लेख है कि प्रथम आगत प्रथम प्रदत्त के अनुसार नियुक्ति की जाए लेकिन बीएसए ने ऐसा नहीं किया। दिवाकर ने यह भी कहा कि तब उन्होंने बीएसए से बात की तो उन्होंने कहा था कि वह नियुक्ति पत्र वापस भेज दें। तब तुम्हें दूसरा नियुक्ति पत्र लिपिक पद का दे दिया जाएगा। उनके कहे अनुसार उसने चतुर्थ श्रेणी का नियुक्ति पत्र बीएसए को 26 फरवरी 2013 को वापस कर दिया। फिर भी बीएसए ने लिपिक पद का नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया, जबकि वह उनके पास लगातार चक्कर लगाता रहा।
दिवाकर ने कहा कि हर तरफ से थक हारकर उसने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का दरवाजा खटखटाया। आयोग ने दोनों पक्षों की सुनवाई करने के बाद एक सितंबर 2016 को निर्णय देते हुए उसे मृतक आश्रित के अंतर्गत लिपिक पद पर नियुक्ति की कार्रवाई करते हुए एक माह के अंदर अवगत कराने का आदेश दिया। फिर भी लिपिक पद पर उसकी नियुक्ति नहीं की। उसने यह भी तर्क दिया कि दो अन्य की विभाग ने लिपिक पद पर बाद में नियुक्ति की। बोला-अफसोस तो इस बात का भी है कि बेसिक शिक्षामंत्री अनुपमा जायसवाल को उसने शिकायती पत्र देने के साथ ही उनसे व्यक्तिगत मुलाकात भी की फिर भी कार्रवाई नहीं हुई। 10 मई 2017 को उसने प्रमुख सचिव को नियुक्ति के लिए प्रार्थना पत्र दिया। वह 24 नवंबर 2016 को सचिव बेसिक शिक्षा परिषद से भी मिला। इसके बाद भी उसे न्याय नहीं मिला तब उसने परिवार के साथ आत्मदाह का निर्णय लिया।