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लगान के विरोध पर अंग्रेजों ने बरसा दी थीं गोलियां

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बदायूं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मार्च 1921 और नवंबर 1929 में महात्मा गांधी के बदायूं दौरे के बाद 1942 में आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बदायूं का दौरा किया। उन्होंने यहां गुरुकुल महाविद्यालय में क्रांतिकारियों की सभा की थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ नारे से आजादी के दीवानों में खासे लोकप्रिय थे। नेताजी के दौरे के बाद स्वतंत्रता आंदोलन और गहरा गया। अब क्रांतिकारी अंग्रेजों की गोलियों से भी नहीं डरते थे।
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बदायूं दौरे के बाद क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत को लगान देने से इंकार कर दिया। 16 जनवरी 1942 के बदायूं की तहसील गुन्नौर के गांव जगन्नथपुर में (अब संभल की तहसील) में क्रांतिकारियों और अंग्रेज पुलिस में सामने-सामने संघर्ष हो गया। क्रांतिकारी इससे पहले अंग्रेजों को चुनौती देते हुए दिसंबर 1941 में क्रांतिकारी चौधरी बदन सिंह के नेतृत्व में बितरोई रेलवे स्टेशन फूंक चुके थे। कई जगह रेल पटरियों कोभी नुकसान पहुंचाया था। ऐसे में अंग्रेज हुक्मरान बौखलाए हुए थे। लगान का विरोध करने पर अंग्रेज सिपाहियों ने क्रांतिकारियों पर गोलियां बरसा दीं। इसमें दो दर्जन क्रांतिकारी घायल हुए और क्रांतिकारी कृष्णलाल शहीद हो गए थे। जगन्नाथपुर कांड के बाद क्रांतिकारियों और अंग्रेज पुलिस में जगह-जगह झड़पें होने लगीं। इनमें कई क्रांतिकारी शहीद हुए तो अंग्रेज सिपाही भी मारे गए। स्वतंत्रता संग्राम इतिहास के जानकारों की माने तो 1942 के आंदोलन के बाद से ही अंग्रेजी हुकूमत के पैर उखड़ने लगे थे।
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क्रांतिकारियों को खाना पहुंचाते थे नत्थू सिंह
गुलड़िया निवासी मास्टर नत्थू सिंह का जन्म 1930 में हुआ था। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने तक वह किशोर अवस्था में पहुंच गए थे। गुलड़िया में रूंध की पटिया के पास जंगल में क्रांतिकारियों की मीटिंग हुआ करती थीं। मास्टर नत्थू सिंह बताते हैं कि उनके गांव के कई क्रांतिकारी स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा ले रहे थे। अंग्रेजों की क्रांतिकारियों पर नजर थी। ऐसे में क्रांतिकारियों की टोलियों को उन्होंने कई साल तक खाना पहुंचाने का काम किया। कई बार अंग्रेज सिपाही उनको रोक कर पूछते थे, तब वह खेत पर खाना ले जाने की बात कह दिया करते थे।
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आज भी याद हैं अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 1931 में जन्मे मास्टर दामोदर सिंह को अंग्रेजों के जुल्मों का दास्तान अब भी याद है। 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने तक वह करीब 17 साल के हो चुके थे। मास्टर दामोदर सिंह बताते हैं कि किस तरह से अंग्रेज क्रांतिकारियों का मदद करते थे। क्रांतिकारियों को यातनाएं दी जाती थीं। अंग्रेज सिपाही जब घोड़ों पर चढ़कर गांव में आते थे तो दहशत का माहौल बन जाता था। उस समय अपने बुजुर्गों से भी उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की कहानियां सुनीं। आंदोलन की यादें धुंधली जरूर हुई हैं, लेकिन अंग्रेजों के जुल्म अब भी याद हैं।
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(सभी तथ्य गजेटियर और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जुड़ी पुस्तकों के साभार)
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