बदायूं। दिवाली पर यदि कहीं तेज आवाज के पटाखे छूट रहे हैं तो बच्चों को वहां से दूर ही रखें। नहीं तो उनके सुनने की शक्ति पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। भविष्य में उनके बोलने में भी दिक्कत खड़ी हो सकती है। वहीं सांस के मरीज भी दूर रहें तो उनके स्वास्थ्य के लिए बेहतर रहेगा।
हर साल दिवाली पर लोग विभिन्न प्रकार की रोशनी और तेज आवाज के पटाखों को आकाश में छोड़ते हैं। हालांकि उस वक्त तो उन्हें अच्छा लगता है किंतु बाद में उसका रिजल्ट उतना अच्छा नहीं होता।
जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. आरसी दीक्षित कहते हैं कि पटाखे जलाने से हवा में बारूद के छोटे कण फैल जाते हैं, जिससे लोगों को सांस लेने में परेशानी के साथ ही आंखों और नाक में जलन की समस्या हो सकती हैं। पटाखों से निकलने वाले प्रदूषक तत्वों में रसायन, जहरीली गैसें धुएं में घुलकर सांस की नलियों में प्रवेश कर संक्रमण पैदा करने के साथ वायु को दूषित करने का काम करती हैं। दमा, फेफड़े आदि की बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों को अधिक सावधानी बरतनी चाहिए।
डॉ.शरद गुप्ता ने कहा कि तेज आवाज के पटाखों का सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। इनमें एक माह से नीचे के बच्चे के सुनने की क्षमता खत्म हो सकती है। साथ ही आगे चलकर उसके बोलने में भी दिक्कत आ सकती है।
फिजीशियन डॉ.सचिन गुप्ता ने कहा कि अस्थमा और सांस से संबंधित जितने भी मरीज होते हैं उन्हें पटाखों के धुएं से दूर रहना चाहिए। धुएं से आंखों की रोशनी पर असर पड़ता है। फेफड़े की परेशानी से संबंधित मरीजों को भी बहुत अधिक दिक्कत होती है। सो उन्हें पटाखों के धुएं और आवाज से दूर ही रहना चाहिए। हो सके तो मुंह और नाक पर मास्क का प्रयोग करना चाहिए।
नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सुधा रानी ने कहा कि पटाखे जलाते समय आंखों को लेकर खास सतर्कता बरती जाए ताकि पटाखों से निकलने वाले जहरीले धुएं से आंखों में जलन जैसी परेशानी से बचा जा सके। इसके अलावा आंखों में बारूद की चिंगारी चले जाने पर आंखों की रोशनी तक जा सकती हैं।
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क्या बरतें सावधानियां
-कम धुएं और कम आवाज के पटाखे छोड़ें
-मुंह और नाक पर मास्क या कपड़ा लगाएं
-अस्थमा और फेफड़ों की बीमारी से प्रभावित लोग दूर रहें
-हृदय रोगी भी पटाखों को छोड़ने से बचें
यह भी रखें ध्यान
-छप्पर या झोपड़ी के पास पटाखे न छोड़ें
-जलने पर तुरंत डाले ठंडा पानी, फिर लें डॉक्टर की सलाह
-खुले में पटाखे न जलाएं