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नवाब अब्दुल्ला ने लगवाया था मेला ककोड़

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मेला ककाेड़ - फोटो : अमर उजाला
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कादरचौक। जो लाता है गंगा की परवी की बेला। ककोड़ा का मेला, ककोड़ा का मेला। शमशेर बहादुर आंचल ने अपनी पुस्तक ककोड़ा दर्शन में मेले का जीवंत वर्णन किया है।
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मुगल शासनकाल में लगभग 350 वर्ष पूर्व उझानी के पास अब्दुल्लागंज गांव को नवाब अब्दुल्ला ने बसाया था। उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। अब्दुल्लागंज के पूर्व प्रधान रवींद्र सक्सेना ने बताया कि नवाब को किसी संत ने बताया कि तुम ककोड़ा जंगल में जाओ। वहां पर एक कुएं के पास देवी का स्थल है। तुम वहां रह कर देवी की सेवा करो और वहां से निकल रही गंगा में रोज स्नान करो। नवाब ने वैसा ही किया और वह ठीक हो गए। उसके बाद में उन्होंने वहां पर मेला लगवाया था जो आज तक चल रहा है।
मंदिर महंत धर्मगिरि और प्रधान अनिल द्विवेदी ने कहा कि मंदिर के नीचे एक कुआं है, उसी में देवी का स्थान था। वहां पर निर्माण करा दिया गया है। इस समय मंदिर में सिर कटी देवी की प्रतिमा स्थापित है। हालांकि उनका सिर प्रतिमा के पास ही रखा है। मान्यता है कि देवी का रूहेलों से युद्ध हुआ था, इसमें उनका सिर कटकर गिर गया। तब देवी ने बिना सिर के ही उनका अंत किया था। मेले की परंपरा को मुगल शासन के बाद अंग्रेजों ने भी निभाया। मेले का नक्शा भी अंग्रेजों के जमाने का ही चला आ रहा है। आजाद भारत में सबसे पहले कलक्ट्रेट के माध्यम से मेला लगाया जाता था। इसकी जिम्मेदारी जिला पंचायत को दे दी गई है।
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अंग्रेजों ने मेले के सामान की सुरक्षा के लिए थाने के सामने ही तीन गोदाम बनवाए थे, इसमें मेले का सामान रखा जाता था, लेकिन रखरखाव के अभाव में अब गोदाम भी खंडहर हो गए हैं।
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