फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कड़ाके की ठंड से गेहूं की बल्ले-बल्ले, संकट में सब्जियों का राजा

विज्ञापन
विज्ञापन
कड़ाके की ठंड से गेहूं की बल्ले-बल्ले, संकट में सब्जियों का राजा
विज्ञापन

उझानी (बदायूं)। पर्वतीय क्षेत्र में बर्फवारी होने से मैदानी इलाकों के खेत-खलिहान भी अछूते नहीं बच पा रहे हैं। पिछले चार-पांच दिनों के दौरान तापमान में तेजी से गिरावट के बाद पाला भी पड़ गया। इसका प्रकोप सब्जी फसलों में शिमला मिर्च और टमाटर पर जहां सबसे ज्यादा नजर आया, वहीं सब्जियों के राजा आलू पर संकट मंडराने लगा है। इसके विपरीत गेहूं की फसल के लिए मौजूदा समय अनुकूल है। बढ़वार के दिनों में गेहूं को लो-टेंपरेचर ही चाहिए।
गेहूं की बुआई के करीब महीना भर पहले ही हुई थी। बुआई के समय उसे मौसम से गरमाहट मिली तो अंकुर अच्छे फूटे। पौधों में बढ़वार के लिए गेहूं की फसल को लो-टेंपरेचर की आवश्यकता होती है जो फिलहाल बना हुआ है। पौधों में बढ़वार के साथ ही किसानों ने पहले सिंचाई का काम भी पूरा कर लिया है। अच्छे उत्पादन के संकेत के बीच वैज्ञानिक भी मानते हैं कि 15 जनवरी तक लो-टेंपरेचर का माहौल रहा तो गेहूं की फसल में कोई रोग भी नहीं लगेगा। इलाके में चना और मटर का रकबा काफी कम है लेकिन मौसम उनके अनुकूल बना हुआ है। लो-टेंपरेचर ने सब्जियों के राजा आलू, शिमला मिर्च और टमाटर को परेशानी में डाला है। आलू में झुलसा रोग का प्रकोप दिख सकता है। शिमला मिर्च की पत्तियों पर झुलसा का साया पड़ा तो उसका उत्पादन गिरेगा साथ ही कीट फैलने से टमाटर भी दागी हो जाएगा। सरसों में माहुं फैलने का खतरा बना हुआ है। लो-टेंपरेचर में ही माहुं अपना असर डालती है।
विज्ञापन

--------------
धुआं करने से कम हो जाता है पाले का असर
उझानी। लो-टेंपरेचर के दौरान तुसार (पाला) पड़ता है तो वह पत्तियों पर जम जाता है। पत्तियां झुलसने लग जाती हैं जो पौधे की बढ़वार को रोक कर दाना पड़ने से पहले कंद को चपेट में ले लेती है। देसी नुस्खे पर गौर करें तो आलू के फसल के पास धुआं कर दिया जाए तो तुसार आलू की पत्तियों पर नहीं जम पाता। धुआं उस तरफ से किया जाए जिस तरफ से खेत की ओर हवा का रुख होता है। वैसे, आलू की फसल में सिंचाई करके भी तुसार के प्रकोप से बचा जा सकता है।
विज्ञापन

----------------
लो-टेंपरेचर की वजह से आलू समेत सब्जी की फसलों को नुकसान की आशंका बनी हुई है। इसका वैैैज्ञानिक तरीके से भी इलाज संभव है। किसानों को आलू के खेत में पत्तियां झुलसी नजर आएं तो वैज्ञानिकों को दिखाकर बचाव की जानकारी कर सकते हैं।
- डॉ. संजय कुमार, कृषि वैज्ञानिक
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें