बदायूं। सपा की मानसिकता वाले कई अधिकारियों पर सरकार की तीखी नजर है। सूबे के नगर विकास मंत्री सुरेश कुमार खन्ना के जिले से रवाना होने के कुछ घंटों बाद ही डीएम अनिता श्रीवास्तव को हटा दिया गया। सत्ता पक्ष से जुड़े सूत्रों की बात को यदि सच मान लिया जाए तो कुछ और अधिकारियों का निकाय चुनाव की आचार संहिता लागू होने से पहले बोरिया बिस्तर बंध सकता है।
सत्तारूढ़ बीजेपी के विधायक और सांसद कुछ दिनों पहले हुई जिला विकास योजना की बैठक में अपना दर्द बयां कर चुके हैं। उसमें आंवला के सांसद धर्मेंद्र कश्यप और बिल्सी के विधायक आरके शर्मा ने कुछ अधिकारियों को सपा की मानसिकता वाला बताया। सीधा आरोप लगाया था कि डीएम का अधिकारियों पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं है। पार्टी सूत्र बताते हैं कि तभी से सपा शासनकाल से बने हुए अधिकारियों की विदाई की चर्चा होने लगीं थीं। हालांकि सरकार इस बात का भी संदेश देना चाहती हैं कि वह किसी अधिकारी को जानबूझकर परेशान नहीं करना चाहती है मगर वह कार्यकर्ताओं का मान सम्मान रखने की भी बात करती रही है। सूत्र बताते हैं कि बुधवार को जब पार्टी के कद्दावर नेताओं में शुमार रखने वाले प्रदेश के नगर विकास मंत्री सुरेश कुमार खन्ना यहां पहुंचे तो फिर से नेताओं ने उनके सामने अपना दर्द रखा।
सूत्र कहते हैं कि नगर विकास मंत्री ने शहर विधायक महेश चंद्र गुप्ता से काफी देर तक अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर बात की थी। विधायक ने भी कुछ अधिकारियों के सपा की मानसिकता के अनुसार मनमाने तरीके से काम करने की शिकायत की थी। इसे मंत्री ने गंभीरता से लिया था। चूंकि मंत्री ने खुद भी अधिकारियों को सुधरने की हिदायत दी थी। मगर शहर विधायक के उनके साथ जाने के कुछ घंटों बाद ही डीएम के तबादले की बात सामने आ गई। सूत्र बताते हैं कि महेश गुप्ता समेत कई विधायकों ने सपा शासनकाल से यहां तैनात कई अधिकारियों के बारे में मंत्री को अवगत कराया था। उनका पार्टी हित में हटना जरूरी बताया। आरोप लगाया कि सपा की मानसिकता होने की वजह से वे बीजेपी के कार्यकर्ताओं और नेताओं को महत्व नहीं देते हैं।
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अधीनस्थ अफसरों और नेताओं में तालमेल नहीं बैठा सकीं डीएम
बदायूं। डीएम अनिता श्रीवास्तव यहां अपने छह महीने के कार्यकाल में नेता तो छोड़िए अपने अधीनस्थ अफसरों से तालमेल नहीं बैठा पाईं। विकास भवन के दो अधिकारियों में काफी समय से शीतयुद्ध चल रहा है। एक मीटिंग में दोनों में कहासुनी भी हो गई थी। इसकी काफी चर्चा भी रहीं थीं। प्रशासनिक सूत्र कहते हैं कि डीएम उनके विवाद को दूर नहीं करा सकीं। सो अधिकारी भी अपने तरीके से ही काम को अंजाम दे रहे थे। कई अधीनस्थ अधिकारी डीएम के आदेश को नजरंदाज करते रहे। जिले में एक-दो को छोड़कर भाजपा नेता डीएम की कार्यशैली से खुश नहीं थे।