सब्जियों के राजा आलू की लाल प्रजाति ने इस बार उत्पादकों की बल्ले-बल्ले कर दी है। पैदावार भी पहले के मुकाबले थोड़ी कम जरूर रही लेकिन जिस तरह से उत्पादकों का रुझान बढ़ा है, उससे साफ हे कि अगले साल हाइब्रिड प्रजातियों की तरह ही खेतों में लाल आलू होगा। हालांकि रेट इस बार सफेद आलू से करीब 50 रुपया प्रति क्विंटल कम है लेकिन रकबे में 10 फीसदी की वृद्धि हुई है।
पिछले कुछेक सालों में लाल आलू के प्रति किसानों के रुझान पर गौर करें तो जिले समेत आसपास के इलाके में उसे दूसरे विकल्प के रूप में देखा जा रहा था। इसकी एक वजह यह भी रही कि जिले की मंडियों में उसके खरीदार कम आते थे लेकिन पिछले साल बाहर के व्यापारियों ने जिस तरह से लाल आलू की खरीद की, उससे माल काफी कम पड़ गया। किसान भी यह बात समझ गए थे। उसी का नतीजा रहा कि जिले में पिछले साल तक 75 फीसदी हिस्से में सफेद तो 25 फीसदी हिस्से में लाल आलू के विपरीत इस बार आलू ने 10 फीसदी रकबे की वृद्धि के साथ सफेद आलू की प्रजातियों को 65 फीसदी हिस्से में समेट दिया। आलू कारोबारी राजू चौधरी ने बताया कि लाल आलू की डिमांड बिहार के गोपालगंज और मोतिहारी में ज्यादा है। लाल आलू हालांकि बिहार और प्रदेश के बार्डर के रास्ते नेपाल में भी पहुंच रहा है। लाल आलू का रेट शुरुआत में सफेद के बराबर पहुंच गया लेकिन इलाके में करीब 70 फीसदी तक भंडारण हो जाने से रेट में 50 रुपया प्रति क्विंटल की मामूली गिरावट आई है।
बिल्सी क्षेत्र में सर्वाधिक क्षेत्रफल
लाल आलू यूं तो इलाके के साथ जिले में कादरचौक, बिसौली, सहसवान और दातागंज के कुछेक हिस्से में हुआ लेकिन सर्वाधिक क्षेत्रफल बिल्सी के आसपास के गांवों में रहा। बिल्सी और मुजरिया के बीच रफीनगर, फतुल्लागंज, मुकुइया और नैथुआ के खेतों में तो लाल आलू ने अपनी जड़ें मजबूत कर ली हैं। एक अनुमान के अनुसार जिले में करीब 25 हजार बीघा रकबे में लाल आलू पैदा किया गया तो बिल्सी क्षेत्र में करीब 15 हजार बीघा इलाका बिल्सी क्षेत्र में रहा।
लालू आलू के प्रति किसानों का रुझान धीरे-धीरे बढ़ा है। करीब एक दशक पहले तक जिले में लाल आलू 10 फीसदी में ही सिमट कर रह गया था। लाल आलू की फसल में सफेद के मुकाबले लागत भी कम है। आलू की लाल प्रजाति के जायएदारों को दूसरी प्रजातियां पसंद नहीं आतीं।
- डॉ. संजय कुमार, कृषि वैज्ञानिक