कुवंरगांव (बदायूं)। जहां सोच, वहां शौचालय। स्वच्छ भारत मिशन के तहत बना यह स्लोगन आपको जगह-जगह दिख जाएगा। अहरुईया गांव की पढ़ी लिखी एक बहू की सोच बदली। शादी के बाद पहली बार ससुराल पहुंची बहू ने पति से तोहफे में शौचालय मांगा है। साथ में एक शर्त भी रख दी। जब तक शौचालय नहीं बनेगा तब तक वह ससुराल नहीं आएगी। अहरुईया गांव की यह बहू केशलता है, जो पिछले करीब एक साल से मायके में रह रही है। गरीबी की वजह से उसके ससुराल वाले अपने खर्च पर शौचालय बनवा नहीं पाए। अभी तक सरकारी मदद मिली नहीं। पूरे गांव में इस साहसी बहू केशलता की चर्चा तो है, लेकिन इस परिवार की मदद करने वाला कोई नहीं। न प्रधान और न सरकारी कारिंदे। खास बात यह है कि अहरुईया में पिछले नौ सालों में एक भी शौचालय नहीं बना।
आंखों देखी
स्थान सालारपुर ब्लॉक का अहरुईया गांव। समय सुबह साढ़े पांच बजे। गांव की महिलाएं, बच्चे, बड़े और बूढ़े घर से निकलकर खेतों की तरफ जा रहे थे। किसी के हाथ में पानी भरा लोटा, तो किसी के हाथ में डिब्बा और बोतल। कुछ महिलाएं समूह के रूप में भी थीं। पुरुष ज्यादातर अकेले जाते दिखे। ये सभी लोग खुले में शौच करने वाले थे। ग्रामीणों के मुुताबिक यहां यह नजारा लगभग रोज ही रहता है।
शौचालय बने 57, प्रयोग किए जा रहे 10
अहरुईया गांव की बदायूं शहर से दूूरी महज 19 किलोमीटर होगी। यहां की आबादी 24 सौ के करीब है। यहां रहने वाले 350 परिवारों में एक हजार वोटर हैं। इस पूरे गांव में 57 कुल शौचालय हैं। इनमें 50 सरकारी मदद से बने और बाकी सात शौचालय लोगों ने निजी खर्चे पर बनवाए। इन 57 में फिलहाल केवल 10 शौचालयों का प्रयोग किया जा रहा है। प्रयोग किए जाने वालों में सरकारी मदद से बने केवल तीन ही शौचालय हैं। शेष 47 शौचालयों में ज्यादातर ध्वस्त हो गए या बदहाल पड़े हैं। कुछ शौचालयों को दूसरे कामों में प्रयोग किया जा रहा है।
पढ़ी लिखी हूं, बाहर नही जाऊंगी
पति बीर बहादुर से शादी में तोहफा के रूप में शौचालय मांगने वाली केशलता से अमर उजाला प्रतिनिधि ने फोन पर बात की। वह बोली- मैं बीकॉम पास हूं। मेरे मायके में शौचालय है। इसलिए मुझे बाहर जाने की आदत नही है। मैं शादी में ससुराल पहुंची तो पता चला कि वहां शौचालय नहीं है। शौच को घर के सभी लोग खेतों में जाते हैं। मगर मगर मैं तो खेत में नहीं जा सकती। ससुराल वाले जब तक शौचालय नहीं बनाएंगे मायके में ही रहूंगी। केशलता का मायका बरेली भोजीपुरा इलाके के ग्राम मसीद में है।
पैसा होगा तो बनवा लेंगें
अहरुईया गांव की गीता कहती हैं कि उनके घर में शौचालय नहीं बना। इतना पैसा है नहीं जो खुद बनवा लें। ऊपर वाले सुनते नहीं, चाहे प्रधान हों या अधिकारी। शौच के लिए खेतों में न जाएं तो क्या करें? जब हमारे पास पैसा होगा तो बनवा लेंगे।
खुले में शौच को जाना मजबरी
जयलाल का कहते हैं कि उनके घर में चार परिवार है। इनमें दो लोगों ने तो खुद शौचालय बनवा लिए हैं। उनकी इतनी कमाई ही नहीं होती, जो शौचालय बनवा सकें वह भी चाहते हैं कि हमारे घर की महिलाएं बाहर न जाएं। बाहर जाने पर कीड़े-मकोड़ों से भी डर लगता है। मगर क्या करें, खुले में शौच जाना मजबूरी है।
अभी पैसा नहीं मिला
अभी शौचालय बनवाने के लिए पैसा नही मिला है। विभाग जब पैसा भेजेगा तो शौचालय बनवाए जाएगें। गांव का सर्वे कराकर पंचायत राज विभाग को भेज दिया है।-
राजेश्वरी देवी, प्रधान
इस ब्लाक में टिगरिंग चल रही है। टिगरिंग होने के बाद लाभार्थियों को पैसा भेज दिया जाएगा। अभी शौचालय बनवाने का अभियान चल रहा है।- शशिकांत शर्मा, प्रभारी डीपीआरओ
ओडीएफ का अभियान तेजी से चलाया जा रहा है। पूरे जिले को ओडीएफ कराने का लक्ष्य है। सभी पात्र लाभार्थियों को शौचालय बनवाने के लिए पैसा दिया जाएगा।-अनिता श्रीवास्तव, डीएम