बिजनौर में आबादी के हिसाब से बेहद कम डॉक्टरों और स्टाफ से जूझ रहे सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर आने वाले गंभीर मरीजों को तात्कालिक उपचार दिलाने की बजाय उसे रेफर करने को प्राथमिकता दी जाती है। सरकारी एंबुलेंस मरीजों को दूरदराज के क्षेत्रों से स्वास्थ्य केंद्रों पर तो लेकर आ जाती हैं। लेकिन यहां पहुंचने पर रोगियों को उपचार दिलाने की बजाय जिला अस्पताल रेफर करने की पर्ची थमा दी जाती है।
हालात यह हैं कि पीएचसी और सीएचसी के मरीजों के कम घायल या बीमार होने या एक्सरे करवाने तक के काम के लिए भी रेफर कर दिया जाता है। स्टाफ की कमी का असर भी पीएचसी और सीएचसी पर साफ देखा जा सकता है। एक्सरे मशीन तो है मगर टैक्नीशियन नहीं है। उधर, सीएमओ डा. मनमोहन अग्रवाल के अनुसार मरीजों को ले जाने के लिए एंबुलेंस व्यवस्था दुरुस्त हैं। स्टाफ की कमी और सीमित बजट के कारण व्यवस्थाएं प्रभावित होती हैं। इन्हें ठीक कराने की पूरी कोशिश की जा रही है।
मंडावर सीएचसी में एक्सरे मशीन भी नहीं
मंडावर स्थित सीएचसी पर तो आज तक एक्सरे मशीन तक नहीं है। गंभीर रोगियों की सर्जरी का तो मतलब ही नहीं क्योंकि आपरेशन थियेटर पर सालों से ताले लटके हैं। यहां की मशीनों पर धूल जम गई है। नूरपुर स्थित पर स्वास्थ्य केंद्र पर आखिरी बार ऑपरेशन कब हुआ था। यह स्टाफ को भी याद नहीं है।
मलेरिया है तो भी जाओ जिला अस्पताल
अधिकांश सीएचसी पर खून की जांच जैसे शुगर, हीमोग्लोबीन आदि तो हो जाती है। लेकिन मलेरिया की जांच करानी होती या पीलिया से पीड़ित मरीज हो तो उसे भी जिला अस्पताल जाने की सलाह दे दी जाती है।
स्टाफ के नखरे भी कम नहीं
बीमारियों की जांच करवाने में सहायक स्टाफ के नखरे भी कम नहीं होते हैं। कभी लो वोल्टेज तो कभी जनरेटर के बहाने मरीजों को टरका दिया जाता है। दो बजे के बाद सीएचसी तो क्या जिला अस्पताल तक में एक्सरे नहीं होता है। यहां पर एक्सरे शीट तक खत्म हो जाती हैं।
साढ़े दस बजे तक ही लेंगे सैंपल
खून की जांच करने में भी जिला अस्पताल का जवाब नहीं है। यहां पर खून के सैंपल करीब साढ़े दस बजे तक ही लिए जाते हैं। बाद में डेढ़ दो बजे तक रिपोर्ट दी जाती है। अगर कोई साढ़े दस बजे से बाद में आए तो या तो सैंपल लिए ही नहीं जाते या फिर रिपोर्ट अगले दिन दी जाती है।
पीने को मिल रहा गंदा पानी
नजीबाबाद सीएचसी में लगे एकमात्र इंडिया मार्का हैंडपंप से गंदा पानी आ रहा है। नूरपूर सीएचसी पर भी सीमेंटेड वाटर टैंक से पानी में गंदगी आती रहती है। मरीजों का कहना है कि अस्पताल में भी शुद्ध पानी नहीं तो कहां सही मिलेगा।
मरीजों को भर्ती करने का रिस्क
कई सीएचसी और पीएचसी पर एक ही चिकित्सक होने के कारण ओपीडी ही हो पाती है। रात को स्टाफ नहीं रुकता। यहां मरीजों को भर्ती करने का रिस्क स्टाफ नहीं लेता। मरीजों को किसी न किसी बहाने से जिला या निजी अस्पताल भेज दिया जाता है। यहां पूरी रात सभी बेड खाली पड़े रहते हैं।