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Bijnor News: बिजनौर के गुलदार का काशी-चित्रकूट में पर्यटक करेंगे दीदार

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रजनीश त्यागी
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बिजनौर। प्रदेश का एक भी चिड़ियाघर ऐसा नहीं बचा, जहां बिजनौर के गुलदार न हों। प्रदेशभर के संरक्षित वन क्षेत्र इनका नया ठिकाना बन रहे हैं। पिछले छह माह में पकड़े गए 42 गुलदार में से अधिकांश को शिवालिक, अमानगढ़, चित्रकूट, काशी के जंगलों में छोड़ा गया है। वहीं शुक्रवार को पकड़े नगीना के हमजापुर कठैर से पकड़े गए गुलदार का ठिकाना तय करने में वन विभाग जुटा हुआ है।
बिजनौर जिले में गुलदार बड़ी समस्या बन चुका है। यहां गन्ने के खेतों में गुलदार की आबादी पिछले पांच साल में तेजी से बढ़ी है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले छह माह में ही 42 गुलदार पिंजरों में फंस चुके हैं। वहीं पिछले तीन सालों में इनके हमलों में मरने वाले इंसानों की संख्या जिले में 36 तक पहुंच चुकी है।
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अब जिले में गुलदार पकड़ने के लिए 150 से ज्यादा पिंजरे अलग-अलग जगहों पर लगाए जा चुके हैं। जिनमें सप्ताह में औसतन एक गुलदार पकड़ा जा रहा है। एक साल पहले तक गुलदारों को गोरखपुर, कानपुर, लखनऊ के चिड़ियाघर, इटावा के लॉयन सफारी में भेजा जा रहा था, लेकिन वहां अब गुलदार को रखने की जगह ही नहीं बची है। ऐसे में वन विभाग ने इन्हें आबादी से दूर संरक्षित वन क्षेत्रों में ही छोड़ने का फैसला लिया है।
डीएफओ जय सिंह कुशवाह ने बताया कि वरिष्ठ अधिकारियों से निर्देश के बाद ही गुलदार को चिड़ियाघर या संरक्षित वन क्षेत्र में भेजने का निर्णय लिया जाता है। पिछले कुछ दिनों में अधिकांश गुलदार ऐसे ही जंगलों में छोड़े गए हैं। इस बात का पूरा ध्यान रखा जा रहा है कि वह जगह ऐसी हो, जहां से ये गुलदार आबादी तक वापस न आ सकें।

- गन्ने के गुलदार संरक्षित वन क्षेत्र में कैसे रुकेंगे
भले ही वन विभाग गुलदार को संरक्षित वन क्षेत्रों में भेज रहा है, लेकिन यह चिंता भी सता रही है कि ये गुलदार वहां कैसे रुकेंगे। वन्य जीव विशेषज्ञ जॉयल लॉयल कहते हैं कि गुलदार का जन्म जैसे क्षेत्र में हुआ है, वह बड़ा होने पर उसी तरह का जंगल तलाशता है। ऐसे में बड़ा खतरा उनके वापस आबादी वाले क्षेत्रों में लौटने का रहता है।
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- गुलदार की नसबंदी का प्रोजेक्ट भेजा गया
डीएफओ जय सिंह कुशवाह ने बताया कि बिजनौर जैसे जिले में गुलदार की बढ़ती आबादी चिंता का विषय है। यहां लगातार हमले भी होते हैं। ऐसे में इनकी संख्या पर नियंत्रण के लिए इनकी नसबंदी का प्रोजेक्ट तैयार किया गया था। वन विभाग की ओर से शासन स्तर पर यह प्रोजेक्ट जा चुका है। यह प्रक्रिया थोड़ी लंबी जरूर रहेगी, लेकिन स्थायी समाधान इससे संभव होगा।
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