चुनावी संग्राम में दांव पर है कई दिग्गजों की प्रतिष्ठा
रजनीश त्यागी
बिजनौर। यूं तो चुनावी मैदान में उतरे सभी उम्मीदवारों का दावा है कि वह अपने क्षेत्र के अगले विधायक होंगे। विधायक बनने के लिए हर फार्मूले पर काम किया जा रहा है, लेकिन विधायक का ताज किसके सिर पर होगा यह तो मतदाता का मन बता सकता है या फिर 10 मार्च को ईवीएम से निकलने वाले परिणाम बताएंगे। उधर, चुनावी संग्राम में उतरे कई उम्मीदवारों के लिए नतीजे उनके राजनैतिक भविष्य के लिए अहम होंगे। ये परिणाम उनका अगला राजनीतिक भविष्य तय कर सकते हैं। मंत्री से लेकर सांसद और दो-दो, तीन बार विधायक रह चुके उम्मीदवारों पर अपने राजनीतिक कॅरियर को बचाने का दबाव है। (संवाद)
भारतेंद्र, अशोक, रुचि की प्रतिष्ठा दांव पर
साहनपुर रियासत के राजा भारतेंद्र सिंह के नाम राजनीति का लंबा सफर है, मगर 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद वह जातीय समीकरण में उलझी नजीबाबाद सीट से मैदान में हैं। वह अपनी पारंपरिक बिजनौर सदर सीट को छोड़कर नजीबाबाद में भाग्य आजमाने उतरे हैं, जहां उन पर जीत का बड़ा दबाव माना जा रहा है। यही कुछ तस्वीर धामपुर विधानसभा सीट से मैदान में उतरे अशोक राणा की भी है, बसपा और भाजपा सरकार में विधायक रहने के बाद अब उन्हें फिर से विधानसभा पहुंचने के लिए लंबी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सदर सीट से मैदान में उतरीं कुंवरानी रुचि वीरा वोटर को मनाने के लिए हर संभव कोशिश में लगी हैं। सपा और रालोद से राजनीति में पहचान बनाने के बाद उन्हीं दलों के वोटर को मनाना बड़ी चुनौती है। साल 2014 के उपचुनाव से विधायक बनने के बाद एक प्रभावशाली महिला नेता के रूप में अपनी पहचान बना चुकीं रुचि वीरा को 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा से भी सफलता नहीं मिली, उससे पहले साल 2017 में भी उन्हें विधानसभा जाने का रास्ता नहीं मिला।
तसलीम, मनोज और ओमकुमार पर हैट्रिक दबाव
हैट्रिक बनाने का दबाव बिजनौर जिले की तीन विधानसभा सीटों पर फिर से मैदान में नजीबाबाद से विधायक तसलीम अहमद, नगीना से मनोज पारस और नहटौर से ओम कुमार लगातार दो बार से विधायक हैं। तीनों का फिर से विधानसभा में जाने का सपना है, मगर 10 साल तक की गई लंबी सेवा में नाराज माने जा रहे वोटरों को मनाना तीनों के लिए बड़ी चुनौती है। क्योंकि तीनों के सामने वर्तमान चुनाव में समीकरण अलग-अलग हैं।
ओमवेश, मूलचंद, गाजी के रसूख की लड़ाई
साल 2002 के मुलायम यादव की सरकार में गन्ना मंत्री बनने के बाद जिले के प्रभावशाली नेताओं में नाम रखने वाले स्वामी ओमवेश अपनी पारंपरिक चांदपुर विधानसभा सीट से लंबे समय बाद मैदान में हैं। ओमवेश को 2007 के चुनाव के बाद वोटर और राजनीतिक दलों ने सहारा नहीं दिया, यह चुनाव उनके लिए सबसे अहम माना जा रहा है। कुछ यही हाल धामपुर विधानसभा सीट से सपा छोड़कर बसपा में शामिल हुए मूलचंद चौहान का भी है, लंबे समय तक सपा में रहने के बाद एन वक्त पर पार्टी ने उनका टिकट काट दिया। यह चुनाव उनके लिए कितना मायने रखता है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने विधानसभा जाने के लिए सपा छोड़ने में देरी नहीं की, लेकिन उनके सामने जातीय समीकरण चुनौती बने हुए हैं। वहीं, बढ़ापुर से बसपा के साथ मैदान में उतरे मोहम्मद गाजी को भी मतदाताओं से बड़ी उम्मीद है। बसपा सरकार में प्रभावशाली विधायकों के साथ चर्चाओं में रहने के बाद मोहम्मद गाजी को 2012 में धामपुर विधानसभा सीट के वोटरों ने मायूस किया था।
नीरज, सीपी सिंह, शाहनवाज की एंट्री दमदार
बिजनौर सदर सीट से गठबंधन उम्मीदवार डॉ. नीरज चौधरी पेशे से डॉक्टर हैं। यूं तो उनके पिता तेजपाल सिंह विधायक और मंत्री रह चुके हैं, मगर नीरज चौधरी को राजनीति का ककहरा सीखना बाकी है। यह चुनाव इनके लिए राजनीतिक एंट्री है। वहीं, नूरपुर विधानसभा सीट से मैदान में उतरे सीपी सिंह एक प्रमुख व्यवसायी के तौर पर जाने जाते हैं। नजीबाबाद सीट से बसपा के चुनाव चिह्न पर मैदान में उतरे राजनीति के धुरंधर रहे नगीना चेयरमैन स्वर्गीय खलीलुर्रहमान के बेटे शाहनवाज खलील पर राजनीति में अपनी पहचान बनाने का पहला मौका है।
शाहनवाज खलील- फोटो : BIJNOR
भारतेंद्र सिंह।- फोटो : BIJNOR
अशोक राणा।- फोटो : BIJNOR
रूचिवीरा।- फोटो : BIJNOR
तसलीम अहमद।- फोटो : BIJNOR
मनोज पारस।- फोटो : BIJNOR
ओमकुमार।- फोटो : BIJNOR