फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

धामपुर में 1985 से गरमा गया था अयोध्या का राम मंदिर निर्माण का मामला

विज्ञापन
विज्ञापन
धामपुर में 1985 में गर्माया था राम मंदिर निर्माण का मुद्दा
विज्ञापन

धामपुर। हिंदू समाज की आस्थाओं से जुड़ा राममंदिर का मुद्दा 1985 में गर्मा गया था। विहिप ने जब राम ज्योति यात्राएं प्रारंभ की तो धामपुर के रामलीला बाग में ज्योतिरथ आया था, जिसके अंदर बड़े बड़े साधु-संत आगवानी कर रहे थे। नगर के अंदर रथ के आने का जब समाचार मिला तो हिंदू समाज के लोग पूजा करने के लिए अपने आवश्यक कार्यों को छोड़ रामबाग पहुंचे। इसके पश्चात विहिप ने एक ईंट एक रुपया लेकर अयोध्या की ओर कूच करने का आह्वान किया। हिंदू समाज का तरुण, युवा या नौजवान, अयोध्या की ओर कारसेवक बन कर रवाना हो गया। 1985 में आंदोलन ने प्रचंड रूप ले लिया। 1989 में विहिप एवं बजरंग दल ने संयुक्त रूप से आह्वान किया कि कार सेवक जत्थे के माध्यम से जेल भरो आंदोलन चलाएंगे।
ये दीवाने कहां चले, जेल चले भई जेल चले
धामपुर क्षेत्र में श्याम स्वरूप सराफ, डा. नेमीशरण वर्मा, पूर्व राज्यमंत्री महावीर सिंह, मास्टर धर्मपाल सिंह मधी, पूर्व विधायक थम्मन सिंह गहलौत, देवेंद्र सराफ, जनेंद्र कुमार जैन, रुद्र्रपाल सिंह, शंकरदास नारंग, महंत पीयूष, डा. दुर्गा सिंह, बजरंग दल के संयोजक डा. इंद्रदेव सिंह, कैलाश मित्तल व विद्यार्थी परिषद के ऋषभ जैन, ईश्वरचंद्र शर्मा, महेंद्र धनौरिया, रामरक्षपाल राणा, भारत सिंह भनौटी, पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह चौहान, कट्टुमल बर्तन वाले, रामकिशन चौधरी, भगवानदास जोशी, राजू गुप्ता, लाला ओमप्रकाश गुड़वाले, कस्तूरीलाल आहुजा, विजय जैन आदि प्रतिदिन किसी एक स्वयं सेवक के नेतृत्व में राधाकृष्ण मंदिर, जिसे पंडित होरी महाराज का मंदिर कहा जाता है, यहां से प्रतिदिन कारसेवकों का जत्था नगर के मुख्य मार्गो से होता हुआ यह कहता हुआ ये दीवाने कहां चले- जेल चले भई जेल चले। रामलला हम आएंगे- मंदिर भव्य बनाएंगे के उद्घोष के साथ निकलता था। पुलिस आगे-आगे शांतिपूर्वक जत्थे को लेकर आगे बढ़ती थी। जत्था पुलिस कोतवाली जाकर शांतिपूर्वक गिरफ्तारी देता था और वाहनों से कारसेवकों को प्रशासन की ओर से बनाई गई अस्थाई जेलों में ठूस देता था। इस दौरान रेलवे स्टेशन के पास पकोड़ी का ठेला लगाने वाले भोले सैनी जत्थे को देखकर खुशी में थाने की दीवार पर चढ़ कर नारे लगाते था कि अंदर की बात है- पुलिस हमारे साथ है। यह सुनकर पुलिस वाले भी बहुत खुश होते थे।
विज्ञापन

जहां भी रुकते थे कारसेवक, मिलता था भरपेट भोजन
यह आंदोलन 1990 के प्रारंभ में गांव-गांव गली-गली पहुंच गया। अयोध्या जाने वाले कारसेवकों की रेल एवं बसें जहां भी रुकती थी, वहीं कारसेवकों को जलपान और भोजन भरपेट कराया जाता था। बस हो या रेल, कोई भी अधिकारी या कर्मचारी कारसेवकों को टिकट लेने के लिए भी बाध्य नहीं करता था। कार सेवकों को निशुल्क यात्रा कराते थे।
यह रामभक्त गए थे जेल
पूर्व विधायक डा. इंद्रदेव सिंह बताते हैं कि क्षेत्र के रामभक्त श्याम स्वरूप सराफ, देवेंद्र सराफ, महावीर सिंह, डा. नेमीशरण, थम्मन सिंह गहलौत, धर्मपाल सिंह मधी, जनेंद्र कुमार जैन, कैलाश मित्तल, रुद्रपाल सिंह भगवानवाला, शंकरदास नारंग, ब्रजमोहन चतुर्वेदी ,डा. दुर्गा सिंह, डा. इंद्रदेव सिंह आदि को लंबे समय तक जेलों में रखा गया था। शिवसेना के विजय जैन को भी जेल में परेशान किया गया।
कई कारसेवक हुए थे पुलिस की गोली का शिकार
अक्तूबर 1990 में जब अभियान ने जनआंदोलन का रूप ले लिया तो 30 अक्तूबर 1990 अयोध्या में कारसेवकपुरम से विहिप के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल के नेतृत्व में कारसेवकों का जत्था श्री राम जन्म भूमि की ओर से कूच गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने निर्दोष कारसेवकों पर गोली चलवा दी, जिसमें कानपुर के दो कोठारी बंधु गुंबद पर ध्वज फहराते हुए शहीद हो गए और न जाने कितने माओं के लाल पुलिस की गोली के शिकार हो गए। कार सेवकों के मुंह से एक ही आवाज निकल रही थी। मंदिर बनाकर ही वापस जाएंगे। चाहे जान रहे या चली जाएं। इसी दौरान प्रदेश के सीएम मुलायम सिंह यादव ने बिजनौर में जनसभा को संबोधित करते बोला था कि अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय नहीं होने दूंगा। जैसे ही सीएम हेलीकॉप्टर से उड़े तो सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे।
विज्ञापन

1991 में जनता ने मुलायम सरकार का तख्ता ही पलट दिया
बताते हैं कि 1991 में प्रदेश में जब चुनाव हुए तो प्रदेश की जनता ने मुलायम सरकार का तख्ता पलट कर रामभक्तों की बहुमत वाली भाजपा की सरकार बनवा दी। जब कल्याण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी तो विहिप और बजरंग दल ने फिर राममंदिर आंदोलन खड़ा कर दिया। सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई में रथयात्रा निकली, जिसमें गुजरात के नरेंद्र मोदी उनके सहयोगी के रूप में शामिल रहे। यह यात्रा धामपुर में केएम इंटर कालेज के मैदान में जब आई तो जनसैलाब उमडे़ पड़ा। छह दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने एक नारा दिया कि तेल लगाओ डाबर का- नाम मिटाओ बाबर का और यह देखते ही देखते सारे गुंबद धराशाई हो गए और प्रदेश के सीएम कल्याण सिंह ने पूरी घटना की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकारते हुए इस्तीफा दे दिया था।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें