दूसरा बैल खरीदने के नहीं थे रुपये
उससे जुए को थामने की मजबूरी पूछी तो बताया कि बीमारी में एक बैल मर गया, इसलिए कहीं जाना हो तो वह खुद एक जुआ अपने कंधे पर रख लेता है। उसने अपना नाम सुरेश बताया और कहा कि वह थाना नांगल क्षेत्र के गांव छिंदोक में रह रहे हैं।
घुमंतू परिवार से हैं, इसलिए अलग-अलग जाने के लिए आज भी बैल बुग्गी, तांगे का इस्तेमाल करते हैं। उसने कहा कि आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, इसलिए दूसरा बैल अभी तक नहीं खरीद पाए हैं। एक बैल गाड़ी को नहीं खींच सकता, इसलिए उसके साथ गाड़ी खिंचवानी पड़ती है।
किसानों के लिए कृषि यंत्र बनाकर बेचता है सुरेश
यूं तो सुरेश ने अपने बारे में ज्यादा बताने से इन्कार कर दिया, लेकिन इतना जरूर बताया कि इनकी रोजी रोटी इलाके के किसानों के कृषि यंत्र बनाना और उनकी मरम्मत करना है। इनका घर इनकी बैल-बुग्गी ही है। जहां रोजी-रोटी मिल जाती है, वहीं बुग्गी रुक जाती है। इन्हीं परिवारों में एक सुरेश का परिवार भी है।
गरीबी तो खैर इनकी नियति है, लेकिन सुरेश पर इसकी मार कुछ ऐसी पड़ी कि एक बैल बीमारी के कारण मर गया। आर्थिक तंगी के कारण दूसरा बैल नहीं खरीद पाया। अब अगर आप इनकी रोज के क्रियाकलाप देखेंगे तो आपको अंदाजा लगेगा कि बैल इनकी जिंदगी में कितना महत्व रखते हैं।