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खादर में खड़ी गन्ने की फसल रेड रॉट की चपेट में

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बिजनौर के शेरकोट में रेड रॉट से बर्बाद गन्ने की फसल दिखाता किसान। - फोटो : BIJNOR
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खादर में खड़ी गन्ने की फसल रेड रॉट की चपेट में
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बिजनौर। जिले में खादर क्षेत्र में खड़ी गन्ने की फसल रेड रॉट की चपेट में आ गई है। नदियों में ज्यादा पानी आने से नमी की वजह से रेड रॉट की बीमारी फैली है। तराई क्षेत्र में रेड रॉट आने से किसान चिंतित है। चीनी मिलें भी सक्रिय हो गई हैं। तराई क्षेत्र में खड़ी फसल को बीज के रूप में प्रयोग न करने और जिन खेतों में रेड रॉट है, उनमें एक या दो साल तक गन्ना न बोने को कहा जा रहा है।
गन्ना जिले की प्रमुख फसल है। करीब सवा दो लाख हेक्टेयर जमीन में गन्ने की फसल खड़ी है। नदियों के किनारे खादर क्षेत्र में भी काफी गन्ना बोया गया है। जिले में गंगा, रामगंगा, खो आदि की बेल्ट में गन्ने की फसल है। नदियों के किनारे करीब 20 हजार हेक्टेयर जमीन में गन्ने की फसल है। यहां तक कि खादर क्षेत्र में तो गंगा की धारा की बीच में बनने वाले टापूओं में भी गन्ने की फसल बोई जाती है। इस बार खादर में खड़ी गन्ने की फसल रेड रॉट की चपेट में आ गई है। तराई में कई जगह पर खड़ी गन्ने की फसल रेड रॉट की वजह से सूखने लगी है। शेरकोट क्षेत्र के मोहल्ला तराई कोटरा व कस्बा में आदि गांवों में रेड रॉट का प्रकोप ज्यादा देखने को मिल रहा है। यहां काशीपुरा हाईवे के ऊंचा होकर बनने से से खो, रामगंगा नदियों का पानी नहीं निकल पाया और खेतों में ज्यादा समय तक भरा रहने से नमी बढ़ गई। रेड रॉट आने से चीनी मिलें भी चौकस हो गई हैं। धामपुर चीनी मिल ने किसानों से खेतों में खड़ी फसल से खुद बीज के रूप में प्रयोग न करने तथा दूसरों को भी न देने को कहा है। साथ ही कहा गया है कि जिन खेतों में रेड रॉट का असर है वहां पर खेत खाली करने के बाद कम से कम एक या दो साल तक गन्ने की फसल न बोई जाए। इन खेतों में बाकी फसल बोने को कहा गया है।
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पिछले साल 0238 प्रजाति में मिला था रेड रॉट
पिछले साल गन्ने की 0238 प्रजाति में पूर्वी उत्तर प्रदेश में रेड रॉट का असर देखने को मिला था। गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर ने इसके बारे में गन्ना विभाग को बताया था। जिन क्षेत्रों में रेड रॉट बीमारी 20 प्रतिशत तक है वहां गन्ने की तत्काल कटाने के निर्देश दिए गए थे। प्रभावित खेतों की गहरी जुताई कराकर ठूंठों को नष्ट करने को कहा गया था।
ऐसी होती है रेड रॉट
रेड रॉट बीमारी में गन्ने की जड़ गलकर लाल होने लगती है। जड़ के साथ साथ गन्ने का तना भी लाल होने लगता है। रेड रॉट प्रजाति के गन्ने को बीच से काटने पर उससे सिरके जैसी बदबू आती है। इस तरह के गन्ने का तना व अंगोला भी सूखने लगता है। धीरे धीरे गन्ना गांठों पर से टूटकर अलग भी होने लगता है।
फफूंद की वजह से फैलती है बीमारी
रेड रॉट बीमारी एक तरह की फफूंद होती है। खेत में ज्यादा नमी ज्यादा समय तक रहने तक यह फैलती है। अगर यह परिस्थिति सामान्य जंगल में होगी तो वहां भी रेड रॉट का प्रकोप आ सकता है। रेड रॉट से प्रभावित गन्ने का वजन बहुत कम हो जाता है। रेड रॉट प्रभावित कुछ गन्न भी अगर किसी खेत में बो दिए जाएं तो वे पूरे खेत की फसल को चपेट में ले सकते हैं।
नहीं है कोई इलाज
रेड रॉट बीमारी एक गन्ने से दूसरे गन्ने में भी फैल सकती है। इसके अलावा रेड रॉट बीमारी से ग्रसित बीज बोने पर नई फसल में भी रेड रॉट होता है। इसका कोई इलाज नहीं होता है। इसकी रोकथाम ही इसका इलाज है।
किसानों को कर रहे जागरूक
धामपुर चीनी मिल के जीएम केन आजाद सिंह के अनुसार किसानों को एक या दो साल तक रेड रॉट प्रभावित खेतों में गन्ने की फसल न बोने के लिए कहा जा रहा है। किसान रेड रॉट से प्रभावित खेत का बीज बोएंगे तो इससे भी बीमारी बढ़ेगी।
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रोग रहित गन्ना बोएं
जिला गन्ना अधिकारी यशपाल सिंह के अनुसार किसान किसान रोगरहित गन्ने को छांटकर बोएं। कुछ मिलों में गन्ने के बीज को गरम करने के प्लांट लगे हैं। यहां से किसान बीज को शोधित कराकर गन्ना बोएं।
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