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...तो क्या ऐसे ही स्वच्छ और निर्मल होगी गंगा!

Mon, 11 Jan 2016 12:49 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, बिजनौर
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बिजनौर में ....ऐसे तो निर्मल हो गई गंगा! हर साल की भांति इस बार गंगा की रेती में जहर घोलने की तैयारी हो गई है। गंगा क्षेत्र में पलेज लगाने के लिए गड्ढे खोदकर तैयार हो गए तथा उनमें खाद व कीटशानक डाला जा रहा है। अधिकारी सब कुछ जानकर भी अनजान बने है। अधिकारी स्वयं नमामि गंगे अभियान को पलीता लगाने में लगे है।  हर साल बिजनौर में बालावाली से लेकर जहानाबाद क्षेत्र तक गंगा किनारे पलेज लगाई जाती है। यह सारी भूमि वन विभाग, सिंचाई विभाग व ग्राम समाज की भूमि है। इस साल भी उक्त भूमि पर पलेज लगाने क तैयारी हो चुकी है। गंगा की रेती में डेढ़ से ढाई फुट गहरे गड्ढे खोद दिए गए हैं। इन गड्ढों में यूरिया, एनपीके (नाईट्रोजन फास्फोरस व पोटेशियम), कूड़ी की खाद, जैक्सेन पाउडर को मिलकर गड्ढों में भरा जा रहा है। इसके बाद उनमें पलेज की लगाई जाएगी। पलेज तैयार होने के बाद भी कई बार उस पर कीटनाशक का हानिकारक कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है। यूरिया खाद व कीटनाशक जमीन में घुल जाता है। इससे बारिश व गंगा में आए पानी के जमीन में घुला जहरीला तत्व स्वच्छ व निर्मल गंगा जल में मिल जाता है। यह पूरा मामला वन विभाग व प्रशासन के अधिकारियों के संज्ञान में है, लेकिन अधिकारी सभी कुछ जानते हुए अभी अनजान बने हैं।
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कीटनाशक का छिडकाव है प्रतिबंधित
गंगा किनारे किसान अपनी जोत की जमीन पर फसल की बुआई करते हैं। गंगा में जलीय जीवों को हानि न हो, इसके लिए किसानों पर भी गंगा किनारे जोत की जमीन पर कीटनाशक का छिड़काव करने पर          प्रतिबंध है, लेकिन किसान भी इस भूमि पर धड़ल्ले से कीटनाशक का छिड़काव करते हैं।


जलीय जीवों के अस्तित्व पर संकट
गंगा कई जलीय जीवों का वासस्थल है। गंगा किनारे कीटनाशकों का छिड़काव होने व खाद का अंधाधुंध उपयोग होने से गंगा का पानी दूषित होता जा रहा है। गंगा में रहने वाली कई जीवों का जीवन संकटग्रस्त हो चला है। गंगा में घड़ियाल, डाल्फिन, कई प्रजातियों की मछलियां, कछुये आदि कई प्रजातियों के जलीय जीव रहते हैं। पहले के मुकाबले उनकी संख्या में कमी आई है।
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कछुओं की पांच प्रजातियां संकटग्रस्त
डब्ल्यूडब्ल्यूफ के संजीव यादव ने बताया कि गंगा में कछुओं की 27 प्रजातियां पाई जाती है। गंगा जल के दूषित होने के कारण लगातार उनकी संख्या में कमी आ रही है। 27 में से कछुओं की पांच प्रजातियां दुर्लभ हो गए। उनकी संख्या न के बराबर रह गई तथा उनके दुर्लभ श्रेणी में रखा गया है।


इनकी लगाई जाती है पलेज
पलेज लगाने के लिए गड्ढे तैयार हो गए है। इन गड्ढों  में ककड़ी, खरबूजा, तरबूज, लौकी, करेला, खीरा, काशीफल आदि लगाए जाएंगे। डीएफओ सलील कुमार शुक्ला का कहना है कि जिस विभाग की भूमि पर पलेज लगाई जा रही है। पलेज लगाने से रोकने की जिम्मेदारी उसी विभाग की है। वन विभाग की भूमि पर किसी भी कीमत पर पलेज नहीें लगाने दी जाएगी। वह स्वयं इसका संज्ञान लेकर कार्रवाई करेगे।
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