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पेपर मिलों के आगे आर्थिक संकट

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स्कूल-कालेज खुले लेकिन कागज की मांग में बढ़ोत्तरी नहीं
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बिजनौर। स्कूल-कॉलेज खुलने के बाद भी कागज की मांग में ज्यादा वृद्धि नहीं हुई है। कागज की मांग नहीं बढ़ने से जिले की पेपर मिल महीने में 15 दिन बंद रहती हैं। इससे कर्मचारियों की आय पर भी फर्क पड़ रहा है। पेपर मिलों के मालिकों ने केंद्र सरकार से दखल देकर आर्थिक पैकेज देने की मांग की है।
जिले में कई पेपर मिल संचालित हैं। जिले की मिलों में बनने वाला पेपर प्रदेश भर में सप्लाई होता है। पेपर का उत्पादन उसकी मांग पर निर्भर करता है। लॉकडाउन के समय तो पेपर मिलें बंद ही रहीं। अनलॉक होने के बाद पेपर मिलों में भी काम शुरू हुआ। हालांकि स्कूल कॉलेज बंद होने से पेपर मिल महीने में केवल आठ से दस दिन ही चलती थीं। अब स्कूल-कॉलेज खुल चुके हैं। हालांकि पेपर की मांग में अब भी ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है। रामा पेपर मिल किरतपुर में पहले प्रतिदिन 250 टन कागज बनता था। मांग कम होने से अब केवल 150 टन कागज ही बन रहा है। कागज की मांग बहुत कम है। फैक्टरी 15 दिन चलती है और 15 दिन बंद रहती है। मिल मालिकों का कहना है कि स्कूल-कॉलेज तो खुल गए, लेकिन विद्यार्थियों की संख्या वहां बहुत कम हैं। कोचिंग सेंटर पर भी विद्यार्थियों की संख्या कम है। बच्चे अब ऑनलाइन पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। इस वजह से स्कूल, कॉलेज खुलने के बाद भी कागज की डिमांड नहीं बढ़ी है।
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रद्दी की कीमत बढ़ने से लागत बढ़ी
कागज की मांग कम हुई और कागज कम आया। इसका भी मिलों पर विपरीत असर ही पड़ा है। मिलें जनता से ही रद्दी खरीदकर उसे रिसाइकिल करती हैं। लॉकडाउन से पहले मिल रद्दी 13 रुपये किलो खरीद रहीं थी। अब रद्दी के दाम भी बढ़कर 15 रुपये प्रति किलो हो गए हैं। इससे कागज की उत्पादन लागत भी बढ़ गई है। लागत बढ़ने से भी मिलें ज्यादा कागज बनाने का रिस्क नहीं ले रही हैं।
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सरकार दे ध्यान
रामा पेपर मिल के मालिक अरुण गोयल का कहना है कि पेपर मिलों को आर्थिक परेशानी उठानी पड़ रही है। सरकार को पेपर इंडस्ट्री की ओर ध्यान देना चाहिए। कोई आर्थिक पैकेज देना चाहिए, जिससे आर्थिक संकट से जूझ रही पेपर मिलों को राहत मिल सके।
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