आर्य संन्यासी के रूप में
आर्य विद्वान जय नारायण अरुण के अनुसार सेवानिवृत्त होने पर उन्होंने संन्यास ले लिया और आर्य समाज इलाहाबाद के एक कक्ष में रहने लगे। अपने पिता पंडित गंगा प्रसाद की जन्मशती पर उन्होंने बिजनौर आर्य समाज में आयोजित कार्यक्रम में स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती को बुलाया था। छह सिंतबर 1981 को इन्हीं के कर कमलों से भवन पर लगे पत्थर का अनावरण कराया था।
स्वाती सत्यप्रकाश का लेखन
स्वामी सत्यदेव के शिष्य पंडित दीनानाथ ने अनुसार उन्होंने अपने अध्यापन काल में 22 से ज्यादा छात्रों को डीफिल कराई। 150 से अधिक उनके शोध प्रकाशित हुए। अपने सेवाकाल में उन्होंने कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे।
फाउंडर ऑफ साइंसेस इन एंसिएंट इंडिया, कवांइस ऑफ एंसिएंट इंडिया, एडवांस केमिस्ट्री ऑफ रेयर एलीमेंट उनकी लिखी प्रमुख पुस्तक हैं। आर्य संन्यासी सन्यासी बनने पर उन्होंने आर्य समाज संबंधित साहित्य लिखा। अब तक वेदों को अंग्रेजी अनुवाद अंग्रेजों द्वारा किया गया था।
डॉ. सत्यप्रकाश सरस्वती ने अंग्रेजी में 26 खंडों में चारों वेदों का अनुुवाद किया। इसके अलावा शतपथ ब्राह्मण की भूमिका, उपनिषदों की व्याख्या, योगभाष्य आदि साहित्य का सृजन किया। जय नारायण अरुण कहते हैं कि वे चाहते थे कि बिजनौर में स्वामी सत्य प्रकाश सरस्वती स्मृति पर कार्य हो। बिजनौर आर्य समाज में उनका संपूर्ण वाग्मय हो, किंतु ऐसा नहीं हो सका। इनकी कुछ पुस्तक आर्य समाज पुस्तकालय में मंगवाई भी गईं थी, लेकिन दीमक लगने से अधिकांश खत्म हो गईं।