बिजनौर में ई-रिक्शा में बैठ कर स्कूल से लौटते बच्चे।
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बिजनौर में ई-रिक्शाओं में बच्चे जान जोखिम में डालकर स्कूल जा रहें हैं। शहर में चल रही ई-रिक्शाएं किसी बड़े हादसे की वजह बन सकती है।
जिले में करीब दस हजार ई रिक्शा चल रही हैं। इनमें बिजनौर शहर में करीब ढाई हजार हैं। परमिट वहन विभाग के अनुसार इनमें मात्र 413 ही पंजीकृत हैं। अधिकांश चालकों के पास ड्राइविंग लाइसेंस नही हैं। 14-14 साल के बच्चे इनको चला रहे हैं। ई-रिक्शाएं बच्चों को स्कूल लाने ले जाने के लिए लगी हैं। अभिभावक भी यह जानना गवारा नहीं करते हैं कि उनके बच्चों को स्कूल ले जाने वाला रिक्शा चालक किस मोहल्ले का रहने वाला है। बताया गया कि अनेक लोगों ने रिक्शा किराए पर ले ली हैं। इनका शहर में न कोई ठिकाना है तथा न ही कोई अतापता है। अभिभावक बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं हैं। उन्होंने वासु की घटना से भी सबक नहीं लिया।
भूसे की तरह ढोए जा रहे हैं छात्र
स्कूली छात्र भूसे के बोरों की तरह इन ई-रिक्शाओं में भरे जा रहे हैं। तीन से चार बच्चे चालक अपने आसपास बैठा रहे हैं। चार से छह बच्चे तक रिक्शा के बाहर पिछली साइड में लगे फ्रेम में बैठा दिए जाते हैं। अंदर सीट पर सात- आठ बच्चे बैठाए जाते हैं। पीछे की दोनों सीटों के बीच में चार पांच बच्चे खड़े कर दिए जाते हैं। सस्ते के चक्कर में अभिभावक भी ध्यान नहीं दे रहे कि बच्चे उनके किस तरह स्कूल ज रहे हैं। हालत ये है कि ई रिक्शा में बीस से तीस तक बच्चे ढोए जा रह हैं।
प्रशासन की नाक के नीचे चल रही अनाधिकृत ई रिक्शा
प्रशासन की नाक के नीचे अनाधिकृत ई-रिक्शाएं धड़ल्ले से चल रही हैं। परिवहन विभाग इन रिक्शाओं का कोई चैकिंग नही करते हैं। इनके कारण आए दिन शहर में जाम लगा रहता है। जो पुलिस के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। हालांकि एआरटीओ अरुण वार्ष्णेय का कहना है कि ई रिक्शा चालक का डीएल एवं पंजीकरण जरूरी है। विभाग इस पर गंभीर है। शासन द्वारा बांटी गई ई रिक्शाओं के चालकों का पंजी करण हो गया है। निजी रूप से रिक्शा खरीदने वाले मात्र नौ लोगों ने पंजीकरण कराया है। एआरटीओ अरुण वार्ष्णेय के अनुसार सितंबर माह में ई रिक्शाओं का व्यापक चकिंग अभियान चलाया जाएगा। एक रिक्शा में अधिकतम चार सवारी ही बैठ सकती हैं। स्कूली बच्चों के लिए भी यही नियम हैं।