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आंखों की रोशनी की कमी को आत्मविश्वास उजाले से पूरा कर रहे प्रशांत -अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस

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प्रशांत कुमार। - फोटो : BIJNOR
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बरूकी (बिजनौर)। दिव्यांगता कोई अभिशाप नहीं है। यदि व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करता है तो उसे कामयाबी जरूर मिलती है। बिजनौर के रहने वाले प्रशांत कुमार ने इस बात को साबित किया है।
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आदर्श नगर निवासी प्रशांत का जीवन सामान्य चल रहा था। पढ़ाई चल रही थी और नौकरी की तैयारी भी, लेकिन 2008 में 23 वर्ष की उम्र में उन्हें महसूस हुआ जैसे उनके सिर में कुछ भारीपन है। चिकित्सकों को दिखाया डॉक्टरों ने ब्रेन ट्यूमर की आशंका जताई। आशंका सही साबित हुई और प्रशांत को ब्रेन ट्यूमर की पुष्टि हो गई। चिकित्सक ने बताया कि ऑपरेशन ही एकमात्र विकल्प है लेकिन ऑपरेशन होने की स्थिति में आंखों की रोशनी जा सकती है। जान बचाने के लिए ऑपरेशन कराना जरूरी था। ऑपरेशन के साथ ही प्रशांत की आंखों की रोशनी भी पूरी तरह जाती रही। जीवन अंधकारमय दिखाई दे रहा था। तभी दोस्त के एक भाई ने देहरादून स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्लाइंड हैंडीक्राफ्ट के बारे में बताया। सन 2012 में प्रशांत देहरादून चले गए। 2013 में उन्होंने संस्थान में कंप्यूटर चलाना सीखा। वहीं से बीएड किया और नौकरी के लिए अप्लाई करते रहे।
2016 में उन्होंने बैंक के चार एग्जाम क्वालीफाई किए। प्रशांत के सामने चार नौकरियों के ऑफर थे, साथ ही संघर्षों का प्रतिफल भी मिलने जा रहा था। इलाहाबाद बैंक में नौकरी शुरू की। नौकरी के दौरान उन्हें नेत्रहीन मानकर सामान्य काम दिए जाते थे। उन्होंने बैंक में कंप्यूटर की मांग की, जिसे कई बार नजरअंदाज किया गया। लेकिन बाद में बैंक द्वारा उन्हें कंप्यूटर सिस्टम दिया गया। वर्तमान में बिजनौर स्थित इलाहाबाद बैंक में कार्यरत प्रशांत कुमार बैंक की रिकवरी का काम देखते हैं। शाखा प्रबंधक भी उनकी जिजीविषा के कायल हैं। प्रशांत बताते हैं कि वह टॉकिंग सॉफ्टवेयर के जरिए टेक्नोलॉजी से जुड़े हैं तथा टेक्नोलॉजी नेत्रहीन व्यक्तियों का जीवन आसान बना रही है। वह कहते हैं कि कोई भी परेशानी बड़ी नहीं है। परिस्थितियों से संघर्ष कर बड़ी से बड़ी परेशानी को हराया जा सकता है।
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