बढ़ावा मिला तो मिट्टी के बर्तनों को मिल गया बाजार
बिजनौर। एक दौर था जब बाजार में दीपावली पर मिट्टी के दीये और गर्मी के मौसम में घड़े-सुराही नजर आते थे। इसके अलावा ज्यादातर समय रोजगार न मिलने के कारण परंपरागत तौर पर इस काम से जुड़ा प्रजापति समाज ने भी इस काम से दूरी बना ली थी। बीते कुछ साल से इस कला को प्रोत्साहन मिला, तकनीक मिली तो इनके चाक तेजी से घूमने लगे हैं। मिट्टी के बर्तन घरों में जगह बना रहे हैं। नतीजतन, साल में 40 लाख रुपये तक का कारोबार ढाई करोड़ तक पहुंच गया है।
जिले में 132 गांवों में दस हजार परिवार मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं, जिनकी बिक्री उत्तर प्रदेश के शहरों के अलावा उत्तराखंड में भी हो रही है। प्रदेश सरकार ने माटी कला बोर्ड की स्थापना की और माटी कला रोजगार योजना शुरू की। योजना में माटी कला से जुड़े लोगों को नि:शुल्क इलेक्ट्रानिक चाक दिए गए। दो साल में 100 से ज्यादा परिवारों को इलेक्ट्रॉनिक चाक दिए गए। बैंकों से भी योजनाओं में ऋण दिलाया जा चुका है।
इलेक्ट्रॉनिक चाक ने बढ़ाई क्षमता
पहले सामान्य चाक पर एक दिन में एक कारीगर एक हजार तक कुल्हड़ बना पाता था लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक चाक के जरिये एक दिन में ढाई से तीन हजार कुल्हड़ बन रहे हैं। मिट्टी के बर्तनों में फिनिशिंग भी अच्छी आती है। इससे कीमत अधिक मिलती है। कुछ बर्तनों की कीमत स्टील के बर्तनों जितनी है।
अब घर में नहीं पड़ा रहता माल
पहले मिट्टी के बर्तन के नाम पर कुल्हड़ ही लोगों की जुबान पर था। अब मिट्टी के लस्सी के गिलास और खीर की कटोरी भी आ गई है। माटीकला समिति के सभापति ऋषिराम प्रजापति के अनुसार उन्हें ज्यादा ऑर्डर मिलने लगे हैं। एक मिष्ठान भंडार के मालिक सौरभ सिंघल के अनुसार मिट्टी के बर्तनों में मिठाई का स्वाद बढ़ जाता है। खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के उपाध्यक्ष गोपाल अंजान बताते हैं कि सरकार द्वारा माटी कला काम से जुड़े उत्पादों के प्रचार से उनको फायदा हुआ है।
कप, गिलास, तवे से लेकर वाटर कूलर तक पर कारीगरी
राजकीय इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त शिक्षक शंकरलाल प्रजापति के पौत्र गौरव कुमार प्रजापति व कमल कुमार प्रजापति के घर में 50 साल पहले से धार्मिक मूर्तियां बनाई जाती थीं। पहले ये प्लास्टिक ऑफ पेरिस की होती थीं। बाद में उन्होंने मिट्टी की मूर्तियां बनानी शुरू कीं। अब वह घर में प्रयोग होने वाले अन्य बर्तन भी बना रहे हैं। मिट्टी से बनी एक लीटर पानी की बोतल की कीमत 220 रुपये, छह कप 250 रुपये के हैं। पानी का कैंपर 400 से 800 रुपये तक का है। छह गिलास 380 रुपये तक और लोहे की छड़ी लगा मिट्टी का तवा 120 रुपये का है।