- जिले में एक हजार तक गुलदार होने का लगाया जा रहा अनुमान
-जिले के आठ ब्लॉक के 190 गांव संवेदनशील घोषित हो चुके हैं
-चार साल में 38 लोगों की जा चुकी है गुलदार के हमले में जान
-इस वर्ष साढ़े सात माह में 43 गुलदार पिंजरे में हो चुके हैं कैद
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिजनौर। जिले में गुलदार के हमले अब फिर से शुरू हो गए हैं। तीन दिन में दो बच्चों की जान गुलदार के हमलों में चली गई। वहीं मुखौटा से लेकर गश्त तक वन विभाग के सभी दावे फेल होते नजर आ रहे हैं। तमाम शोध और प्रयास के बाद भी इस विकराल समस्या का समाधान शून्य ही नजर आ रहा है।
गुलदार की समस्या जिले में 2022 से शुरू हुई। लगातार हमले बढ़ते गए और अब इस चार साल में 38 इंसानों की जान गुलदार के हमलों में चली गई।वन विभाग की ओर से अलीगढ़ यूनिवर्सिटी, डब्ल्यूआईआई के विशेषज्ञों से शोध तक कराया गया, लेकिन ठोस समाधान आज तक कोई नहीं दे पाया। आंकड़ों पर नजर डालें तो इस साल अब तक 43 गुलदार बिजनौर वन प्रभाग क्षेत्र से पकड़े जा चुके हैं। इसके बाद भी हर रोज 20 से ज्यादा जगहों पर गुलदार दिखने, पशुओं और इन्सानों पर हमला करने की सूचनाएं वन विभाग के पास आ रही हैं।
संवेदनशील गांवों की संख्या की बात करें तो चार साल पहले मात्र 22 गांवों को संवेदनशील की श्रेणी में रखा गया था, लेकिन अब इन गांवों की संख्या बढ़कर 190 तक पहुंच गई। इस अवधि में 130 से ज्यादा गुलदारों को पकड़ा भी गया है।
- पानी से डरता है गुलदार, सूखे में रहने का आदी
वन्य जीव विशेषज्ञ कहते हैं कि गुलदार पानी से डरता है। इसलिए बरसात में जिन खेतों में पानी भर गया है, वह उनसे निकलकर पुराने खंडहरों, चकरोड, नलकूपों की छतों और पेड़ों पर ही अधिक रहता है। दिन में यह अधिकांश सोता नजर आता है। वहीं रात में यह शिकार पर निकल जाता है। ऐसे में खेतों के पास गांवों में जो घर हैं, वहां इसका सबसे अधिक खतरा रहता है।
- गंध आते ही भाग जाते हैं कुत्ते
आमतौर पर किसी जानवर के आबादी में घुसते ही कुत्ते भौंकना शुरू कर देते हैं, लेकिन गुलदार के मामले में ऐसा नहीं है। गुलदार कुत्ते को मारकर खा जाता है, इसलिए कुत्ते इसे देखकर भाग जाते हैं। वन्य जीव विशेषज्ञ जोएल लायल कहते हैं कि अधिकांश मामलों में यह भी देखा गया है कि गुलदार की गंध आते ही कुत्ते छिप जाते हैं और भौंकना भी बंद कर देते हैं।
- रात में सबसे खतरनाक है यह जीव
चार साल पहले तक गुलदार आबादी के बीच बहुत कम नजर आता था। अब यह आबादी के बीच आ चुका है। गुलदार पेड़, मकान पर चढ़ने, छोटी झाड़ियों में छिपने में माहिर होता है। यह अपने शिकार को भनक तक नहीं लगने देता और अचानक पेड़ से कूदकर, झाड़ियों से निकलकर हमला कर देता है। इसलिए रात में गुलदार प्रभावित क्षेत्र में जंगल जाना खतरे से खाली नहीं है।
- घर में घुसकर बच्चों को उठाना, यह बड़े खतरे का संकेत
वन्य जीव विशेषज्ञ जोएल लायल कहते हैं कि गुलदार आबादी में कम ही आता है। नहटौर में आबादी में गुलदार के जाने का मतलब बड़े खतरे का संकेत है। ऐसे में अब उस क्षेत्र के लोगों को सतर्क रहना चाहिए। खासतौर से किसी को खुले में नहीं सोना चाहिए। क्योंकि उस क्षेत्र के पांच किमी दायरे में यह गुलदार कहीं भी अगला हमला कर सकता है।
वर्जन
नहटौर क्षेत्र में गुलदार को पकड़ने के लिए पिंजरा लगवा दिया गया है। ड्रोन से गुलदार की तलाश हो रही है। टीम को खेत में गुलदार के पगचिह्न मिले हैं। लोगों से सतर्क रहने की अपील की गई है। -जय सिंह कुशवाह, डीएफओ बिजनौर
अब तक गुलदार के हमलों में इंसानों की मौत
वर्ष मौत घायल
2023 17 14
2024 08 16
2025 06 20
2026 04 02
नोट: तीन इंसानों की मौत कालागढ़ क्षेत्र में हुई, जिन्हें वन विभाग उत्तराखंड में मानता है।
साढ़े तीन साल में पकड़े गए गुलदार और कितनों की मौत हुई