अस्तित्व बचाने को जद्दोजहद कर रहा मेनका ताल
मंडावर (बिजनौर)। क्षेत्र के गांव मोहंडिया में स्थित प्राचीन तालाब मेनका ताल अस्तित्व बचाने को जद्दोजहद कर रहा है। मान्यता है कि ये तालाब बहुत प्राचीन है। माना जाता है कि कण्व आश्रम में राजा दुष्यंत ने शकुंतला के साथ गंधर्व विवाह किया था। जाते समय शकुुंतला को अपनी पहचान स्वरूप अंगूठी दे गए थे। मान्यता है कि हस्तिनापुर जाते समय शकुंतला ने इस तालाब पर रुककर पानी पिया था। पानी पीते समय उनकी अंगूूठी इस तालाब में गिर गई थी। अंगूठी को एक मछली ने निगल लिया था।
मंडावर से दो किमी चलकर किरतपुर मार्ग पर गांव मोहंडिया के पूर्व दिशा में स्थित यह तालाब प्राचीन कालीन है। स्वर्ग की अप्सरा मेनका के नाम पर इसका नाम मेनका ताल पड़ा था। यह तालाब महाभारत काल से भी पहले से यहां मौजूद है। मान्यता है कि प्राचीन काल में ऋषि विश्वामित्र और स्वर्ग की अप्सरा मेनका के शकुंतला नामक कन्या हुई। मेनका ने शकुंतला को कण्व ऋषि को सौंप दिया। उन्होंने शकुंतला को पोष्य दुहिता स्वीकारा। कण्व ऋषि एक बार कहीं गए थे। उनके पीछे शिकार करते हस्तिनापुर के शासक दुष्यंत आश्रम आए। शकुंतला और उनके बीच प्यार हो गया। दुष्यंत ने शकुंतला से गंधर्व विवाह किया। आश्रम से जाते समय पहचान के लिए वह शकुंतला को अपनी अंगूठी दे गए। वह कहकर गए कि जल्द ही शकुंतला को हस्तिनापुर ले जाएंगे।
एक दिन कण्व ऋषि के आश्रम में दुर्वासा ऋषि पधारे। उनका क्रोध जग जाहिर था। शकुंतला दुष्यंत के विचारों में खोई थी। इसीलिए उनका स्वागत सत्कार न कर सकी। क्रोध में उन्होंने श्राप दिया कि जिसके सपनों में तूने मेरा निरादर किया है, वह तुम्हें भूल जाएगा। सहेलियों के माफी मांगने और समझाने पर ऋषि शांत हुए और कहा कि उनका श्राप गलत तो नहीं हो सकता, लेकिन पति को उसके द्वारा दी वस्तु दिखाने पर उसे याद आ जाएगा। कण्व ऋषि को वापस आश्रम लौटने पर सच्चाई का पता चला। उन्होंने शकुंतला को शिष्यों के साथ हस्तिनापुर भेज दिया। शकुंतला अपने पति और हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत के पास जा रही थी। रास्ते में उन्हें प्यास लगी और वह पानी पीने के लिए इस तालाब पर रुक गई। पानी पीते समय राजा दुष्यंत की प्रेम चिन्ह के रूप में दी हुई अंगूठी शकुंतला के हाथ से निकलकर तालाब में गिर गई। अंगूठी को एक मछली ने निगल लिया था। मान्यता है कि यह वही तालाब है जिसमें शकुंतला की अंगूठी गिरी थी।
आधे से ज्यादा भूखंड पर है अवैध कब्जा
गांव निवासी रामअवतार व मंगत सिंह ने बताया मेनका ताल करीब 38 बीघा भूखंड में फैला है। तालाब की गहराई करीब 15 फीट है। तालाब के पश्चिमी छोर पर एक प्राचीन देव स्थल है। देव स्थल पर करीब सौ साल पुराना एक पीपल वृक्ष था। वृक्ष सूख कर नष्ट हो चुका है। परिसर में एक देवी मंदिर स्थित है। मंदिर का निर्माण वर्ष 1997 में मोहंडिया निवासी होरी सिंह सैनी ने कराया था। तभी से 80 वर्षीय होरी सिंह मंदिर की देखभाल कर रहे हैं। चेत्र मास के नवरात्रों में यहां पर मेले का आयोजन किया जाता है। होरी सिंह ने बताया कि अनदेखी के कारण यह तालाब अपना अस्तित्व खो रहा है। आधे से ज्यादा भूखंड पर अवैध कब्जा हो चुका है, जबकि कुछ पर प्रशासन ने आवासीय और खेती के पट्टे काट दिये हैं। इससे तालाब सिमटकर केवल कुछ ही भूखंड पर रह गया है। तालाब की साफ-सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। गांव का गंदा पानी इसी तालाब में आकर गिरता है। गांव की सारी गंदगी इसी तालाब में लाकर डाल दी जाती है।
वहीं ग्राम प्रधान यशपाल सिंह का कहना है कि गांव निवासी राजपाल सिंह को मछली पालन के लिए वर्ष 2014 में दस साल के लिए तालाब ठेके पर मिला था। उन्होंने कहा कि वह तो इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाना चाहते हैं लेकिन तालाब पर अभी किसी और का अधिकार है।