अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि और शिक्षाविद महेंद्र अजनबी।
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बिजनौर के महेंद्र शर्मा 26 देशों में जला चुके हैं हिंदी का दीपक
विवेक गुप्ता
बिजनौर। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि और शिक्षाविद महेंद्र शर्मा ने अपना पूरा जीवन हिंदी कविता के विकास के लिए समर्पित कर दिया। हिंदी कविता से उन्हें ऐसा प्रेम हुआ कि उन्होंने सरकारी नौकरी भी छोड़ दी। जनपद बिजनौर के स्योहारा थाना क्षेत्र के ग्राम सरकडा चकराजमल में जन्में महेंद्र शर्मा साहित्य जगत में महेंद्र अजनबी के नाम से प्रसिद्ध है। उनकी हास्य कविताएं मंचों पर खूब पसंद की जाती है। काका हाथरसी जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित महेंद्र अजनबी वर्तमान में दिल्ली में निवास कर रहे हैं और आज भी हिंदी काव्य में अपना योगदान दे रहे हैं। वह अब तक 26 देशों में काव्य पाठ कर चुके है।
प्राथमिक शिक्षा ग्राम सरकडा के प्राथमिक विद्यालय से प्राप्त करने के बाद वह हल्दौर के सीडी इंटर कॉलेज में पढ़े। इसके अतिरिक्त उन्होंने संभल और मुरादाबाद के हिंदू कॉलेज से भी शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई के दौरान ही वह कविताएं लिखने लगे थे। उनकी पहली कविता 18 साल की उम्र में 1977 में अमर उजाला बरेली से प्रकाशित हुई। पढ़ाई के बाद वह दिल्ली में गवर्नमेंट कॉलेज में बायोलॉजी के अध्यापक बन गए। लेखन और अध्यापन साथ साथ चलता रहा। हिंदी कविता से उन्हें ऐसा प्रेम हुआ कि सन 2006 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी। उनकी हास्य कविताएं लोगों को गुदगुदाने लगी और मंचों से बुलावे आने लगे। महेंद्र अजनबी अब तक देश के अनेक शहरों के अतिरिक्त दुनिया भर के 26 देशों में काव्य पाठ कर चुके हैं। अकेले अमेरिका के 56 शहरों में उन्होंने काव्य पाठ किया। अमेरिका में रहने वाले भारतीय काव्य प्रेमी उन्हें निरंतर बुलाते रहते हैं। वह अब तक 14 बार अमेरिका जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त कनाडा, ओमान, सिंगापुर, हॉंगकॉंग, संयुक्त अरब अमीरात, मॉरिशस, बर्मा, थाईलैंड, इंग्लैंड ,जर्मनी, यूरोप, हॉलैंड सहित 26 देशों में महेंद्र अजनबी काव्य पाठ कर चुके हैं । उनकी पुस्तक हंसा हंसा के मारूंगा के लिए वर्ष 2003 का प्रतिष्ठित काका हाथरसी पुरस्कार महेंद्र अजनबी को मिल चुका है। इसके अतिरिक्त पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा द्वारा भी महेंद्र अजनबी को सम्मानित किया जा चुका है। महेंद्र अजनबी दूरदर्शन सहित कई टीवी चैनलों पर काव्य पाठ करते रहते हैं और हिंदी के विकास के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं। उनका मानना है कि हिंदी के विकास में छात्रों के साथ-साथ अभिभावकों को भी योगदान करना चाहिए।