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बाघ से बचने को खेतों में बनाया ठिकाना

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बाघ से बचने को खेतों में बनाया ठिकाना
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बिजनौर। बाघ का डर और सिकुड़ रहे जंगल गुलदार को गांवों में जाने को मजबूर कर रहे हैं। वनों में बाघों का दबदबा बढ़ गया है। इनकी संख्या पहले से अधिक हो गई है। खुद शिकार होने के डर से गुलदार वनों से गांवों की ओर कूच कर गए हैं।
अमानगढ़ वन रेंज कभी गुलदारों के लिए बहुत मुफीद जगह थी। गुलदार वन रेंज से बहुत कम निकलते थे। इसकी सबसे बड़ी वजह थी वन रेंज में बाघों की कम संख्या। अमानगढ़ वन रेंज में 2009 में पहली बार हुई गणना में अमानगढ़ रेंज में 12 बाघ मिले थे, लेकिन पिछले साल हुई गणना में अमानगढ़ में बाघों की संख्या बढ़कर 22 हो गई। साल के आखिरी में एक बाघिन दो शावकों के साथ भी दिखी थी, जबकि गणना के समय शावक नहीं दिखे थे। यानि करीब दस साल में बाघों की संख्या बढ़कर लगभग दोगुनी हो गई। बाघ गुलदार के नैसर्गिक शिकारी होते हैं। गुलदार के शिकार करने से बाघों के लिए शिकार के अवसर कम हो जाते हैं। ऐसे में बाघ गुलदार के सामने पड़ते ही उसे मार देते हैं। जान देने के बजाए गुलदारों ने वन ही छोड़ना ठीक समझा। खेतों में जाने से गुलदारों के सामने बाघ के हमले का खतरा खत्म हो गया है।
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खेतों से मिले थे 12 शावक
पिछले साल जिले में गन्ने के खेतों से गुलदार के 12 शावक मिले थे। इन्हें कानपुर चिड़ियाघर भेजवाया गया था। इसके अलावा धामपुर के गांव करनपुर गांवड़ी में एक गुलदार को वन विभाग की टीम ने पिंजरा लगाकर पकड़ा था। उसे सहारनपुर जिले की वन रेंज में छोड़ा गया।
हादसों का भी होते हैं शिकार
वन्य जीवों का शिकार करने वाले गुलदार भी कभी कभी हादसे का शिकार हो जाते हैं। पिछले साल स्योहारा क्षेत्र में एक गुलदार मृत मिला था। जांच में पता चला था कि पेड़ पर चढ़ते या उतरते समय उसके नाखून टूट गए थे। पेड़ से गिरने पर उसकी मौत हो गई थी।
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तो बच्चों को छोड़ देती है मां
गुलदार स्वभाव से बेहद शर्मीला जीव होता है। यह इंसानों से दूर ही रहता है। प्रणय के समय ये खेतों को अपना आशियाना बनाते हैं। नर व मादा गुलदार अलग अलग रहते हैं। अगर इंसान गुलदार के बच्चों को उठा ले तो बच्चों में इंसानी गंध आने के कारण मादा गुलदार बच्चों को छोड़ देती है।
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