जोगीरम्पुरी दरगाह क्षेत्र में अंजुमन द्वारा बनाए मंजर देखते जायरीन।
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बिजनौर के नजीबाबाद में मातमी जुलूस और मातमी मजलिसों से दरगाह की जियारत करने आए जायरीनों की आंखें चौथे दिन भी नम रहीं। कर्बला के शहीदों की कुर्बानियों की दास्तां सुनकर जायरीनों ने सींनाजनी की।
दरगाह-ए-आलिया नजफे हिंद जोगीरम्पुरी में जायरीनों ने रविवार को मौला अली की बारगाह में नजराना-ए-अकीदत पेश कर मन्नतें मांगी। बतौर तर्वरूख जायरीन दरगाह परिसर में स्थित चश्मे का पानी लेने के लिए बेताब रहे।
जायरीनों का अकीदा है कि चश्मे का पानी बीमारियों से निजात दिलाता है। उधर, शमशुल हसन हॉल में आखिरी दिन भी शिया विद्वानों ने मजलिसों का खिताब करते हुए नेकी, इंसानियत से जिंदगी जीने, करबला के शहीदों की कुर्बानियों से सबक लेने, दीन और इस्लाम की हिदायदों पर अमल करने की सलाह दी।
वाकयाते करबला का जिक्र करते हुए शिया विद्वानों ने क्रूर बादशाह यजीद के जुल्म की कहानी बयां की। उन्होंने कहा कि कर्बला की जंग के जरिये दीन और इस्लाम को बचाने के लिए जो कुर्बानियां दी गई वो कयामत तक याद रखी जाएगी।
मातमी मजलिसों को मौलाना नजर अब्बास, मौलाना इरफान हैदर, मौलाना शौजफ, मौलाना रब्बुल हसन जलालपुरी, गजनफर अब्बास तूसी, मौलाना कलीम अब्बास ने खिताब किया। रविवार को भी देर शाम तक कई अंजुमनों ने मातमी जुलूस बरामद किए। रविवार की देर रात महफिले मसालमा से चार रोजा मातमी मजलिसें खत्म होगी।