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समन्वित फसल प्रबंधन से बढे़गी आमदनी

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समन्वित फसल प्रबंधन से बढे़गी आमदनी
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बिजनौर। कृषि जोत का आकार कम होता जा रहा है और आबादी बढ़ रही है। ऐसे में कम जोत में अधिक पैदावार लेना बड़ी चुनौती बन गया है। इसके लिए कृषि वैज्ञानिक समन्वित फसल प्रबंधन प्रणाली को ही कारगर मानते हैं। जिले के गई किसानों ने इस प्रणाली को अपनाकर आमदनी बढ़ा ली है। कृषि वैज्ञानिक किसानों को एक ही तरह की फसल का उत्पादन छोड़कर कृषि के साथ कृषि आधारित अन्य व्यवसाय भी करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
जिले में गन्ना प्रमुख पैदावार है। बढ़ती आबादी के कारण कृषि जोत का आकार कम होता जा रहा है। इसका असर उत्पादन पर पड़ रहा है। शासन भी किसानों की कृषि आमदनी दोगुना करने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। इस स्थिति में किसानों व कृषि वैज्ञानिकों के लिए कम जमीन से उत्पादन बढ़ाना चुनौती है। कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने के लिए शोध हो रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि किसान को अपनी सोच बदलनी होगी। परंपरागत खेती का मोह छोड़ना होगा। बदलती तकनीक के अनुसार स्वयं को ढालना होगा। तभी कम जोत में अधिक पैदावार लेकर चुनौतियों का मुकाबला किया जा सकता है। बढ़ती आबादी में मूलभूत सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हो सकेंगी।
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कृषि विज्ञान केंद्र नगीना में शोध वैज्ञानिक डॉ. केके सिंह का कहना है कि किसान को खेती की मोनो कल्चर प्रणाली को छोड़ना होगा। किसान को कम रकबे में पैदावार बढ़ाने के लिए एक ही फसल पर आधारित नहीं रहना होगा। अब किसान के लिए समन्वित फसल प्रबंधन प्रणाली अपनाने का समय आ गया है। मूलभूत आवश्यकता पूरी करने के लिए बाजार की निर्भरता कम करनी होगी। जीवन निर्वाह की मूलभूत आवश्यकताएं कम रकबे से पूरी करने के बाद अतिरिक्त आमदनी करनी होगी।
ये है समन्वित फसल प्रबंधन प्रणाली
डॉ. केके सिंह बताते हैं कि समन्वित फसल प्रबंधन प्रणाली में परंपरागत खेती से हटकर दो तीन फसलों की बुवाई प्रणाली अपनानी होती। जिले में किसान गन्ना अधिक बोता है। जिले की जमीन गेहूं, सरसों आदि फसलों की बुवाई के साथ पशुपालन, मुर्गी पालन आदि के लिए उपयुक्त है। इस प्रणाली में फसलों की प्रजाति, जमीन की प्रकृति के अनुसार चयन करना होता है। पशुपालन से जैविक खाद तैयार करके बाजार का मुंह नहीं देखना है। नरेंद्र सिंह किरतपुर ब्लॉक के गांव हकीक़तपुर के रहने वाले हैं। उनके पास 20 बीघा जमीन है। बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र नगीना के वैज्ञानिकों की सलाह पर समन्वित फसल प्रबंधन प्रणाली अपनाई। पहले गन्ना ही बोते थे। अब धान, गेहूं, सरसों की खेती कर रहे हैं। मुर्गी पालन, मछली पालन, पशुपालन भी कर रहे हैं। घर पर ही बर्मी कंपोस्ट इकाई स्थापित कर रखी है। जैविक खाद बनाते हैं। निजी उपयोग के साथ जैविक खाद पैकेट में तैयार करके बेच रहे हैं।
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ऑनलाइन मार्केटिंग भी करते हैं
नूरपुर ब्लॉक के गांव अथाई अहीरपुर के रहने वाले किसान यदुवीर सिंह के पास 12 बीघा जमीन है। वह बासमती धान, गेहूं व सरसों की खेती करके अच्छी कमाई कर रहे हैं। केले की फसल से 60 से 70 हजार रुपये प्रति बीघा कमा रहे हैं। अफजलगढ़ ब्लॉक के गांव उदयपुर के निवासी किसान मनोज कुमार के पास 15 बीघा जमीन है। गेहूं व बासमती चावल पैदा कर रहे हैं। मार्केट में चावल की खूब मांग है। वह विभिन्न फसलों की नर्सरी भी तैयार करते हैं और किसानों को बेचते हैं।
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