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Bijnor News: लकड़ी के ठप्पे की छपाई से मिली छिपियान की पहचान

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राजा का ताजपुर। बदलते दौर के साथ ही कपड़ों की छपाई भी बदल गई है। ताजपुर के मोहल्ला छिपियान को लकड़ी के ठप्पे की छपाई से पहचान मिली। मगर, अब स्क्रीन प्रिंटिंग का प्रयोग बढ़ने से ठप्पे की छपाई गुम हो गई। यहीं वजह है कि इसका काम करने वाले लोग अब बेरोजगार हैं।
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राजा का ताजपुर में काफी लोग लकड़ी के ठप्पे से कपड़े पर छपाई का कार्य करते थे। यहां छपाई किया गया कपड़ा देश-विदेश तक प्रसिद्ध था। लिहाफ, गद्दे व बेडशीट आदि पर हाथों से लकड़ी के ठप्पों से पक्के रंगों से छपाई होती थी। छपाई का काम अधिक होने के कारण एक मोहल्ले का नाम छिपियान रखा गया।
इस मोहल्ले के पास ही रंग के कपड़ों को सुखाने के लिए सरकार ने करीब 10 बीघा जमीन बिरादरी के नाम आवंटित की, जिसे पिछोट के नाम से जाना जाता है। ग्रामीण अमीर हसन, हाफिज इदरीश, मोहम्मद इब्राहिम, नवने हसन, अब्दुल रहीस, खलील अहमद, मोहम्मद आसिफ आदि ने बताया कि हम पक्का रंग मेरठ से लाते थे और दिन-रात छपाई कर पिछोट की जमीन पर कपड़ा सुखाते थे।
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आज स्क्रीन प्रिंटिंग से लकड़ी के ठप्पे की छपाई बंद हो गई। इस वजह से कुछ लोग दूसरा रोजगार कर रहे हैं। कुछ लोगों ने स्क्रीन प्रिंटिंग का कार्य शुरू कर दिया।

छपाई कार्य बंद होने से सतीश बना पेंटर
ताजपुर के मुन्ने सिंह यादव अधिकांश ग्रामोद्योग के लिहाफ गद्दे आदि पर छपाई का कार्य करते थे। उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र सतीश यादव ने भी कुछ समय तक छपाई का कार्य किया। छपाई का काम बंद होने पर वह पेंटर बन गया।
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