होलाष्टक शुरू, मांगलिक कार्य निषेध
बिजनौर। होलाष्टक शुरू हो गए हैं। होलाष्टक आठ दिन के होते हैं। जो 18 मार्च को समाप्त होंगे। इस दौरान कोई भी मांगलिक कार्य करना निषेध माना जाता है। होलाष्टक के साथ मौसम परिवर्तन शुरू हो जाता है। व्यक्ति के रोग की चपेट में आने की संभावना रहती है।
धार्मिक संस्थान विष्णु लोक के ज्योतिषाचार्य पंडित ललित शर्मा के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से पूर्णिमा तिथि तक होलाष्टक माने जाते हैं। होलाष्टक शब्द होली व अष्टक दो शब्दों से मिलकर बना है। इसका अर्थ होता है होली से पहले के आठ दिन। उनका कहना है कि होलाष्टक के समय सभी ग्रह उग्र स्वभाव में होते हैं। इसलिए इस दौरान जो शुभ कार्य किए जाते हैं उनका उत्तम फल प्राप्त नहीं होता है। इसलिए मांगलिक कार्य करना निषेध माना जाता है। होलाष्टक मौसम में बदलाव के द्योतक भी हैं। पंडित ललित शर्मा ने बताया कि शास्त्रानुसार होलाष्टक के साथ मौसम परिवर्तन शुरू हो जाता है। सूर्य का प्रकाश तेज हो जाता है। हवाएं भी ठंडी रहती हैं। ऐसे में व्यक्ति रोग की चपेट में आ सकता है। व्यक्ति की मन की स्थिति अवसाद ग्रस्त रहती है।
इसलिए माना जाता है अशुभ
पौराणिक कथा के अनुसार राजा हिरण्यकशिपु अपने बेटे प्रह्लाद को भगवान विष्णु के भक्ति से दूर रखने के लिए आठ दिन तक कठिन यातनाएं दी थीं। आठवें दिन हिरण्यकशिपु की बहन होलिका प्रह्लाद को जलाने के लिए गोद में लेकर बैठी थी। लेकिन भगवान विष्णु के आशीर्वाद से भक्त प्रह्लाद बच गए और होलिका जल गई थी। इसलिए होलाष्टक को शुभ कार्य करने के लिए अशुभ माना जाता है। होलाष्टक में व्रत, पूजन व दान करना विशेष फलदाई होता है। ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है। व्यक्ति को श्री सूक्त विष्णु सहस्रनाम , हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र का जाप नियमित करना चाहिए। इस साल होलाष्टक 10 मार्च से शुरू हो गए हैं। होलाष्टक 18 मार्च को समाप्त हो जाएंगे। होलिका दहन 17 मार्च को है, उसके अगले दिन 18 मार्च को रंग वाली होली मनाई जाएगी।