बिजनौर में गन्ने के लिए पूरे देश में पहचान बनाने वाले जिले के किसानों ने गेहूं उत्पादन में जैविक विधि को अपनाकर फसल का बंपर उत्पादन किया है। जैविक विधि से बोए खेतों में गेहूं का औसत पांच से छह क्विंटल प्रति बीघा तक निकल रहा है। जैविक विधि से बोया गया ये गेहूं बाजार में 50 प्रतिशत अधिक मूल्य पर बिकेगा।
फसलों के अधिक से अधिक उत्पादन के लिए अधिकतर किसान रासायनिक खेती पर निर्भर हो चुकी हैं। रसायनिक खादों के प्रयोग के बावजूद जिले की मिट्टी की उर्वरक क्षमता लगातार गिर रही है और मित्र कीट भी खत्म हो रहे हैं। इससे खेती में लागत भी बढ़ रही है। प्रधानमंत्री ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का जो मंत्र दिया है उसमें खेती की लागत को कम करना भी शामिल है। रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग जैविक खेती को अपनाकर ही कम बल्कि खत्म किया जा सकता है। कृषि विभाग ने इस साल जैविक तरीके से गेहूं की फसल बोने के लिए 250 किसानों को प्रेरित किया था। इनमें से 213 किसानों ने जैविक खेती से 213 एकड़ जमीन में गेहूं बोए। खेतों में गोबर व जैविक खाद ही डाला गया।
गेहूं की फसल की गाही हुई और औसत निकाला गया तो किसानों के खेतों में पांच से साढ़े पांच क्विंटल प्रति बीघा का औसत निकला है। कहीं-कहीं पर छह क्विंटल प्रति बीघा का भी औसत निकला है। एक बीघा में इतनी औसत से गेहूं निकलना बहुत बड़ी बात है। सामान्य तरीके से गेहूं बोने पर साढ़े चार से पांच क्विंटल प्रति बीघा का औसत निकलना बड़ी बात है। बंपर गेहूं उत्पादन से किसान गद्गद हैं। कृषि विभाग को भी किसानों को जैविक खेती से जोड़ने के लिए आधार मिल गया है।
कृषि उपनिदेशक जेपी चौधरी के अनुसार विभाग ने जैविक खेती की ओर किसानों को जोड़ने की मुहिम के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। जैविक विधि से बोया गेहूं रासायनिक उर्वरक वाले गेहूं से अधिक निकला है। खाद की लागत कम या खत्म कर उत्पादन बढ़ाना जैविक खेती से ही संभव है।
गोबर और गोमूत्र हैं खेती के लिए संजीवनी
देशी गाय की नस्ल जैविक खेती के लिए वरदान है। देशी गाय के गोबर व मूत्र में बैक्टिरिया अधिक होते हैं। हमारी जमीन में बहुत से पोषक तत्व हैं, लेकिन उनको फसल तक पहुंचाने वाले बैक्टिरिया खत्म हो गए हैं। माना जाता है कि एक देशी गाय के गोबर व मूत्र से एक हेक्टेअर जमीन में जैविक खेती की जा सकती है। देशी गाय के गोबर व मूत्र के प्रयोग से खेतों में पोषक तत्वों की कमी नहीं आएगी।
परिणाम चौंकाने वाला निकाला
गांव खानजहांपुर बहादर निवासी अनुदीप शास्त्री ने अपने दो पांच-पांच बीघे के खेतों में एक ही प्रजाति के गेहूं बोए। एक खेत में जैविक विधि से खेती की तो दूसरे खेत में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया। रासायनिक उर्वरक वाले खेत में गेहूं चार से साढ़े चार क्विंटल प्रति बीघा जबकि जैविक विधि वाले खेत में छह क्विंटल प्रति बीघा की औसत से गेहूं निकला है। गांव गजरौला अचपल निवासी किसान नरेंद्र सिंह, मुकुल कुमार, राकेश कुमार के खेत से पांच क्विंटल प्रति बीघा का औसत निकला है। जिन किसानों ने जैविक विधि से गेहूं की खेती की थी उन्होंने खेतों में गोबर की खाद डाली थी। साथ ही खेतों में देशी गाय के मूत्र में गोबर, लहसुन, गुड़ का घोल बनाकर उसे दस दिन तक सड़ाकर स्प्रेकर किया था। इस स्प्रे से फसल में कोई रोग नहीं लगा। बाजार में गेहूं के दाम 1750 रुपये प्रति क्विंटल तक हैं। जैविक तरीके से पैदा हुआ गेहूं बाजार में 50 प्रतिशत अधिक रेट पर बिकता है। हालांकि तीन साल तक किसी खेत में रासायनिक खाद प्रयोग न करने पर किसान की फसल को पंजीकृत किया जाता है, लेकिन इस फसल को बेचने में किसानों को कोई समस्या नहीं होगी।