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भूसे के महंगे दाम, कैसे करें गोशाला में दान

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धामपुर के गांव महमूदपुर बुजुर्ग गौशाला स्थित बैंक में एकत्र करने को भूसा लेकर जाते नहटौर विकास व? - फोटो : DHAMPUR
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भूसे के महंगे दाम, कैसे करें गोशाला में दान
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सतीश शर्मा
धामपुर। गोआश्रय स्थलों में मौजूद गोवंशों के लिए भूसा एकत्रित करने को प्रत्येक ब्लॉक में 15-15 भूसा बैंक खोले गए थे। किसानों से इन बैंकों में भूसा दान करने का आग्रह किया गया था, लेकिन भूसे का भाव खुले बाजार में 1200 रुपये से लेकर 1500 रुपये प्रति क्विंटल चल रहा है। जिसके कारण किसान भूसा बैंकों में भूसा दान नहीं कर रहे हैं। धामपुर ब्लॉक में बीस दिनों में अब तक केवल दो क्विंटल भूसा एकत्र हो सका है। जबकि नहटौर ब्लॉक में सफाई कर्मियों ने भूसा बैंक के लिए 65 क्विंटल भूसा दान कराया है।
मुख्यमंत्री के आदेश पर निराश्रित गोवंशीय पशुओं को आश्रय दिलाने के लिए चारागाह की जमीनों पर अस्थायी गोशालाओं का निर्माण व चारे की बुवाई की जा रही है। कोई पशु भूखा न रहे, इसके लिए प्रत्येक ब्लॉक में 15-15 भूसा बैंक खोले गए। अधिकारी किसानों से इन भूसा बैंकों को भूसा दान करने का आग्रह कर रहे हैं, लेकिन किसान भूसा दान नहीं कर रहे और भूसा बैंक खाली पडे़ हैं। बीडीओ अखिलेश कुुमार का कहना है कि भूसे के दाम 1200 से 1500 रुपये क्विंटल हैं, इसलिए किसान भूसा दान करने को तैयार नहीं हैं। लोगों से अपील की जा रही है, लेकिन उसका भी कोई असर नहीं हो रहा है। नहटौर ब्लॉक के सहायक विकास अधिकारी पंचायत सुशील कुमार व एडीओ डीडी सिंह का कहना है कि उनके ब्लॉक में विभिन्न पंचायतों में कार्यरत 213 सफाई कर्मियों ने 65 क्विंटल भूसा ब्लॉक को दान कराया है। अधिकारियों ने इस भूसे को महमूदपुर गोशाला में एकत्र करा दिया है। इस गोशाला में 50 गोवंशीय पशु हैं।
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भूसे और गेहूं के रेट में 500 रुपये का अंतर
भाकियू तहसील अध्यक्ष राजेंद्र सिंह, गजेंद्र सिंह टिकैत, पंकज कुमार शर्मा का कहना है कि भूसे का बाजार रेट 1500 रुपये क्विंटल और गेहूं का सरकारी रेट 2015 रुपये प्रति क्विंटल है। भूसे और गेेेहूं में केवल 500 रुपये का अंतर है। महंगाई के दौर में भूसा महंगा होने के कारण कोई किसान भूसा दान करने को तैयार नहीं है। यही कारण है कि अधिकारियों की अपील के बाद भी भूसा बैंक खाली पडे़ हैं। उन्होंने कहा कि पिछले साल अक्तूबर के महीने में हुई बारिश के कारण धान की फसल बर्बाद हो गई थी। उसकी पराली नष्ट होने के कारण किसानों को महंगा भूसा खरीदकर पशुओं को खिलाना पड़ा था। किसान इस बार अतिरिक्त भूसे को सुरक्षित रखना चाहते हैं, ताकि सर्दियों में उन्हें दिक्कत का सामना न करना पडे़।
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