संवाद न्यूज एजेंसी
बिजनौर। पराली जलाने से नुकसान व जैविक खाद बनाने के फायदे किसानों को बताएं जा रहे हैं। किसान अवशेष का प्रयोग कर मशरूम जैसी फसल का उत्पादन कर अपनी आर्थिक स्थिति समृद्ध करने में सहयोग ले सकते हैं। पराली, फसल अवशेष का सही उपयोग करने के लिए किसानों को पांच दिवसीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
तमाम प्रयास के बाद भी इस मौसम में दिल्ली, एनसीआर के कई जनपदों के विभिन्न क्षेत्रों धुंध बढ़ने से वायु गुणवत्ता में भी गिरावट आ रही। धुंध आने से आब ओ हवा खराब होने लोगों को सांस लेने में परेशानी होने लगती है। इसीलिए पराली व फसलों के अवशेषों को जलाने की निगरानी धरती से लेकर आसमान से हो रही है। साथ ही गोष्ठी, प्रचार वाहन और नगीना अनुसंधान पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण चल रहा है, जिसमें अधिकारी, वैज्ञानिक किसानों को पराली व फसल अवशेष नहीं जलाने व खाद बनाने को प्रेरित किया जाता है।
n 800 से 1000 रुपये तक बिक रही पराली : किसान सुरपाल सिंह, रामवीर सिंह, राकेश पाल मोनू ने बताया कि धान की कटाई के समय ही पराली बुकिंग हो गई है। कहा कि 800 से 1000 रुपये प्रति बीघा पशुचारे के लिए किसान ही खरीद रहे हैं। काफी किसान पराली को गोवंश आश्रय स्थलों पर पहुंचा रहे हैं।
n पराली व अवशेष की बढ़ रही मांग : नगीना अनुसंधान के वैज्ञानिक डॉ. केके सिंह ने बताया कि पराली व अवशेष जलाने से होने वाले दुष्परिणामों का मानव स्वास्थ्य, मृदा स्वास्थ्य व पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। बताया कि पराली, अवशेष के बैग बनाने व खाद में मशरूम का उत्पादन लिया जा सकता है।