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सामूहिक खुदकुशी: कफन में लिपटकर आए मां और दो बेटियों के शव तो गम में डूबा गांव, चंदे से हुआ अंतिम संस्कार

Fri, 27 Jun 2025 06:01 PM IST
मोहम्मद मुस्तकीम अमर उजाला नेटवर्क, बिजनौर

सार

Bijnor News: कर्ज के तकादे से तंग आकर पुखराज ने पत्नी और दो बेटियों के संग जहर निगल लिया था। पत्नी और दोनों बेटियों की मौत हो गई, जबकि अस्पताल में पुखराज की हालत शुक्रवार को भी गंभीर बनी हुई थी। 
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मां और दो बेटियों के अंतिम संस्कार की तैयारी करते ग्रामीण। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मां और दो बेटियों के शव कफन में लिपटकर एकसाथ घर पहुंचे तो पूरा टंडेरा गांव गम में डूब गया। गांव वालों और रिश्तेदारों ने सहयोग करते हुए अंतिम संस्कार की व्यवस्था की। तीनों की अर्थी एक साथ उठीं तो हर आंख नम हो गई। गमगीन माहौल में रात में 11 बजे कडूला नदी के तट पर अंतिम संस्कार किया गया।
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रमेशिया, अनिता और सविता की फाइल फोटो। - फोटो : अमर उजाला
बृहस्पतिवार सुबह बिजनौर जिले के नूरपुर के गांव टंडेरा गांव में पुखराज सिंह ने पत्नी और दो बेटियों के संग जहर निगल लिया था। हालत बिगड़ने पर चारों को अस्पताल ले जाया गया। उपचार के दौरान पुखराज की पत्नी रमेशिया, बेटी अनीता उर्फ नीतू, छोटी बेटी सविता उर्फ सीटू की मौत हो गई। जबकि पुखराज मेरठ मेडिकल में जिंदगी मौत की जंग लड़ रहा है। 
 

बृहस्पतिवार की देर शाम मां-बेटियों के शव पोस्टमार्टम होने के बाद घर पहुंचे तो पूरा गांव उमड़ पड़ा। रिश्तेदार भी पहुंचे। तीनों शव देखकर हर किसी की आंख में आंसू आ गए। पहले तो दिन निकलने पर अंतिम संस्कार करने की बात कही गई, मगर बाद में रात में ही अंतिम संस्कार का निर्णय लिया गया।
 

रात में ग्रामीणों और रिश्तेदारों ने अर्थी तैयार करने और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में लगने वाला सामान की व्यवस्था की। रात में 11 बजे तीनों शवों को अंतिम संस्कार के लिए गांव के पास ही बहने वाली कडूला नदी पर ले जाया गया। जहां बेटे सचिन ने अपनी मां और दोनों बहनों की चिता को मुखाग्नि दी।
 

बेटियों का आखिरी बार चेहरा नहीं देख सका बेबस बाप
पुखराज अस्पताल में भर्ती है, जो जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है। घर के आंगन में उसकी पत्नी और दोनों बेटियों की अर्थियां तैयार की जा रही थी। हर कोई यह भी कहता नजर आया कि पुखराज आखिरी बार अपनी बेटियों और पत्नी तक का चेहरा भी नहीं देख पाया।
 
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कर्ज के बोझ तले दबकर खत्म हो गया पुखराज का परिवार
न तो परिवार पर खेती की जमीन, न ही कोई स्थायी रोजगार। बस दैनिक मजदूरी ही परिवार के भरण पोषण का सहारा थी। बेटी के विवाह में लिया गया कर्ज उतरने की बजाय ऐसे बढ़ा कि परिवार साहूकारों के चंगुल में फंस गया। आए दिन किसी न किसी को पैसे लौटाने की मशक्कत व घर की जरूरतों को पूरा करना एक चुनौती बन गई थी। यही चुनौती जीवन पर भारी पड़ गई और एक परिवार पूरी तरह से उजड़ गया।

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