नूरपुर के गांव आलमपुर एडवा में मिले गुलदार के शावकों को पांच दिन बीतने के बाद भी मादा गुलदार उन्हें अपने साथ नहीं ले गई। उधर, पांच दिन से बिना गुलदार के जंगल में घूम रहे शावकों के जीवन पर संकट पैदा हो गया है। वन विभाग के कर्मचारी बोतल से दूध पिलाकर शावकों को बचाने का प्रयास कर रहे हैं।
गांव आलमपुर एडवा में शनिवार की सुबह मेघराज सिंह के गन्ने के खेत में गुलदार के तीन शावक मिले थे। मौके पर पहुंची वन विभाग की टीम ने तीनों शावकों को कब्जे में लेकर मादा गुलदार को पकड़ने के लिए जंगल में पिंजरा लगाया था। तीनों शावकों को पिंजरे में रखा था। रात में किसी समय मादा गुलदार वनकर्मियों को चकमा देकर एक शावक को अपने साथ ले गई थी। अगले दिन वह एक शावक के साथ पास के गांव विशनपुरा में घूमती दिखाई दी थी। सूचना पर वन विभाग के कर्मचारियों ने बाकी दोनों शावकों को विशनपुरा के जंगल में रखवा दिया था। सोमवार को वनकर्मी जब शावकों को देखने पहुंचे, तो वहां केवल एक शावक ही मिला, इसे बोतल से दूध पिलाया गया। मंगलवार को दोनों शावक अकेले ही जंगल में घूमते दिखाई दिए। बुधवार को भी वनकर्मी शावकों को नजर रखे रहे तथा उन्हें बोतल से दूध पिलाया गया। पांच दिन बीतने के बाद भी मादा गुलदार दोनों शावकों के पास नहीं फटकी। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि वह एक शावक को लेकर कहीं ओर निकल गई है। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार शावकों की उम्र आठ से दस दिन की है। ऐसे में बिना मां के अकेले जंगल में घूमने पर उनके जीवन को संकट हो सकता है। इस संबंध में डीएफओ सलिल कुमार शुक्ला का कहना है कि शावकों से बिछड़ने के बाद मादा गुलदार को उन्हें अपनाने में दस से पंद्रह दिन लग जाते हैं। वह इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं और शावकों पर पूरी नजर रखी जा रही है।
शावकों को न छुएं
वन अधिकारियों का कहना है कि गुलदार हो या बाघ यदि उनके शावक जंगल में मिलें तो उन्हें बिल्कुल न छुएं। यदि बहुत ही जरूरी हो तो चिकित्सकों के उपचार के दौरान पहने जाने वाले दस्ताने पहन कर ही उन्हें छुंए। उनका कहना है कि मानव के द्वारा छुए जाने के बाद मादा बच्चों को प्राय: स्वीकार नहीं करती। कई बार बच्चों को मार देती है।ऐसे में सभी को सलाह दी जाती है कि जंगल में मिले शावकों को स्वयं न छुएं और वन कर्मियों को उनकी सूचना दें।