बिजनौर में गुजरात एटीएस के हत्थे चढ़ा कदीर अहमद सलीम कुत्ता के जरिए अंडरवर्ड डॉन दाऊद इब्राहीम गैंग से जुुड़ा था। सलीम कुत्ता व कदीर में गहरी दोस्ती थी। 1993 में गुजरात से मुबंई को दहलाने के लिए आई हथियारों व विस्फोट सामग्री की खेप को मुंबई पहुंचाने में टाइगर मेमन के साथ सलीम कुत्ता व कदीर भी साथ रहे थे। मुंबई से लाकर उन्होंने बड़े हथियारों को छिपाया था। गुजरात व महाराष्ट्र की पुलिस ने नजीबाबाद में छापा कर दो एके 47 भी बरामद की थीं।
एक एके 47 सलीम कुत्ता के बहनोई के पास से मुंबई में बरामद हुई थी। मुंबई बम धमाके के मामले में जांच एजेंसियों को दिए गए सलीम कुत्ता और एजाज के इकबाल के बयान काफी महत्वपूर्ण रहे थे और उन्हीं के आधार पर दाऊद इब्राहिम को मुख्य आरोपी साबित किया गया था।
नजीबाबाद, बिजनौर के कई लोगों के तार अंडरवर्ड डॉन दाऊद इब्राहीम गैंग से जुड़े रहे हैं। ये लोग करोबार करने के नाम से मुंबई जाते थे व दाऊद इब्राहीम के गैंग से जुड़ जाते थे। नजीबाबाद क्षेत्र के गांव कल्हेड़ी निवासी सलीम कुत्ता पहले से दाऊद इब्राहीम गैंग से जुड़ा रहा है। सलीम कुत्ता का असली नाम सलीम शेख था। कुत्ते जैसा गुर्राने का कारण उसका नाम सलीम कुत्ता पड़ गया था। कदीर भी सलीम कुत्ता का रिश्तेदार है, गैंग से जुड़े कुछ अन्य लोग भी उसके रिश्तेदार थे। 1993 में मुंबई को दहलाने के लिए गुजरात से मुंबई गई हथियारों की खेप में दाऊद इब्राहीम के दाएं हाथ टाइगर मेमन और एजाज के साथ सलीम कुत्ता व कदीर भी थे। मुंबई से कुछ हथियारों को लाकर सलीम कुत्ता ने नजीबाबाद में छिपा दिया था। सलीम के बहनोई के पास से मुंबई पुलिस के छापे में एक एके 47 राइफल बरामद हुई थी। उसके बाद सलीम कुत्ता को गुजरात पुलिस पकड़ कर ले गई है और वह गुजरात की जेल में बंद है।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक 1995 में मुंबई पुलिस ने छापा मारकर गांव खाई खेड़ी के इफ्तेखार और गांव राहुखेड़ी निवासी अब्दुल कलीम व अय्यूब उर्फ टकला के पास से भी एक-एक एके 47 राइफल बरामद करने का दावा किया था। इनके अलावा 1771 कारतूस व दस मैग्जीन भी मिली थी। बताया जा रहा है कि कोर्ट ने इन लोगों को इसलिए बरी कर दिया था क्योंकि इनका कसूर इतना था कि इन लोगों ने सलीम कुत्ता के कहने पर इन राइफलों को छिपाया था। ये सभी सलीम के रिश्तेदार व दोस्त थे। गुजरात पुलिस 1995 से कई बार कदीर को पकड़ने के लिए नजीबाबाद आई पर वह नहीं मिला था। अगस्त 2015 में पुलिस ने कदीर की तलाश में छापा मारा था। इसके थोड़े दिन गुजरात पुलिस नजीबाबाद पुलिस को कदीर का वांरट सौप गई थी। तब पुलिस कदीर के नहीं मिलने पर दूसरे वांछित इश्तियाक को पकड़ कर ले गई थी।
मछली के धंधे से डी कंपनी तक पहुंच गया था कदीर
19 साल मुंबई में गुजारने के बाद कदीर 1990 में मुंबई से नजीबाबाद लौट तो आया, लेकिन उसका मुंबई और गुजरात आना जाना लगा रहा। इस दौरान दाऊद गैंग के गुर्गों से भी उसका संपर्क बना रहा था। बम धमाकों से उसे सीधे जुड़े होने का मामला सामने आने के बाद भी वह 24 साल तक पुलिस को चकमा देता रहा।
पुलिस की मानें तो कल्हेडी के रहने वाले कदीर के पिता अमीर अहमद 1971 में अपना परिवार लेकर मुंबई चले गए थे। उस समय कदीर की उम्र करीब 15 साल थी। वह वहां पर मछली का कारोबार करने लगे। उम्र के साथ बड़ा होता गया कदीर भी मछलियों के धंधे से जुड़ गया। सलीम कुत्ता के साथ उसकी दोस्ती बढ़ती गई। इस दौरान ये तस्करी करने वालों से जुड़े। तस्करी के दौरान ही इनकी टाइगर मेमन से नजदीकियां बढ़ती गई, जो इन्हें दाऊद तक ले गई। दाऊद के कहने पर मुंबई धमाकों के लिए विस्फोटक सामग्री पहुंचाने के लिए जिन लोगों का चयन टाइगर मेमन ने किया, उनमें सलीम कुत्ता और कदीर भी था। पुलिस का कहना है कि दाऊद 1986 में दुबई चला गया था, 1990 में कदीर भी नजीबाबाद आ गया। लेकिन उसका आना जाना मुंबई और गुजरात लगा रहा और उसके संपर्क दाऊद गैंग से बने रहे। मुंबई धमाकों में विस्फोटक सामग्री पहुंचाने में भी वह शामिल रहा था, जिसका मामला गुजरात के जामनगर में दर्ज है।
शराफत का लबादा ओढ़ बढ़ाता गया कारोबार
मुंबई धमाकों का आरोपी कदीर शराफत का लबादा ओढ़ नजीबाबाद में जिंदगी बशर कर रहा था। पुलिस से बचने के बाद कदीर नजीबाबाद में अपना करोबार बढ़ता गया। आज कदीर के बेटे की नजीबाबाद में कपड़े की दुकान है। रोज कदीर बेटे के साथ दुकान पर बैठता था। कदीर प्रॉपर्टी के कारोबार से भी जुड़ा है। नजीबाबाद में उसने अपने भाइयों के साथ मिलकर मोहल्ला सब्नीग्राम में बाजार बनाया है। कदीर हज पर भी गया था। कदीर कभी भी मुंबई व गुजरात का कोई जिक्र नहीं करता था। लोगों से इस कदर घुला मिला रहता था कि कोई उसके व्यवहार को देखकर नहीं कह सकता था कि वह गुजरात से इतने बड़े मामले में वांछित होगा। परिवारीजनों के अनुसार पांचों वक्त नमाज पढ़ने वाले कदीर का अपराध की दुनिया से कोई ताल्लुक नहीं था।