फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बिल्लों से मिल जाता था मोहल्लों का रुझान

विज्ञापन
विज्ञापन
बिल्लों से मिल जाता था मोहल्लों का रुझान
विज्ञापन

नींदडू। मतदाता आज भले ही प्रत्याशी का खुला समर्थन करने से कतराता हो, लेकिन एक समय बच्चों की शर्ट पर लगे बिल्लों से घर-मोहल्ले का रुझान आसानी से समझ में आ जाता था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चुनाव चिह्न दो बैलों की जोड़ी, भारतीय जनसंघ के निशान दीपक, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के इंतखाबी निशान बाली हसिया एवं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के चुनाव चिह्न हथौड़ा हसिया के कागज के बिल्लों के लिए गांवों में बच्चे पार्टी नेताओं की प्रतीक्षा में रहते थे। मतदाता दो बैलों की जोड़ी और दीपक चुनाव चिह्न वाले बिल्ले लगाने पर गर्व का अनुभव करते थे। कांग्रेस विभाजन के बाद दो बैलों की जोड़ी का स्थान गाय बछड़ा व चरखा चलाती महिला ने ले लिया।
1977 में जनता पार्टी का चुनाव चिह्न हलधर, कांग्रेस का हाथ का पंजा और जनता पार्टी के विघटन के बाद वजूद में आई भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिह्न कमल काफी लोकप्रिय रहे। हाथ का पंजा और कमल के बिल्ले जल्दी ही प्लास्टिक के बिल्लों में तब्दील हो गए। फैंसी बिल्लों की चमक ने मतदाताओं को खूब लुभाया। महिलाओं को रिझाने के लिए पंजा व कमल की बिंदियों का प्रयोग किया गया। क्षेत्रीय दल व आजाद उम्मीदवार भी बिल्लों के माध्यम से सियासी पैठ बनाते नजर आए। बच्चे प्रत्याशी व कार्यकर्ताओं के वाहनों की प्रतीक्षा करते थे।
विज्ञापन
विज्ञापन

धीरे-धीरे बदलाव आया और मतदाता प्रत्याशी या कार्यकर्ताओं के सामने खुलकर बात करने से परहेज करने लगे। वे हर उम्मीदवार के साथ जनसंपर्क कराते और उसे समर्थन का यकीन दिलाने लगे। हां में हां मिलाने का भंडा तब फूटता, जब दरवाजे पर मौजूद उम्मीदवार या कार्यकर्ता के सामने घर से बाहर आने वाले बच्चों की कमीज पर दूसरी पार्टी के बिल्ले लगे मिलते। चुनाव आयोग की सख्ती के कारण अब गली-कूचों में पहले जैसा शोर शराबा नहीं रहा। दिन रात बजने वाले कानफोड़ू लाउडस्पीकरों से ही निजात नहीं मिली, अपितु बिल्लों व झंडों का रिवाज भी सीमित हो गया। प्रत्याशी अब भी मतदाताओं के द्वार पर जाकर मत्था टेक रहे हैं, लेकिन अधिकतर मतदाता खुला समर्थन करने से बचते दिखते हैं। बिल्लों का रोमांच सीमित होने से अब यह अंदाजा लगाना आसान नहीं रहा कि परिवार, मोहल्ला या गांव किस दल या प्रत्याशी को सपोर्ट कर रहा है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें