संवाद न्यूज एजेंसी
बिजनौर। अत्याधिक उत्पादन के लालच में किसान अंधाधुंध रसायनिकों का प्रयोग कर रहे हैं। इससे न सिर्फ खेतों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है, बल्कि उत्पादित फसल लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। मृदा परीक्षण में बिजनौर की करीब 85 प्रतिशत खेतों की मिट्टी में कार्बन सामग्री 0.5 प्रतिशत से कम है, जो कि बांझपन के बेहद करीब है।
खेती को बचाने के लिए किसानों को जागरूक करने के लिए स्योहारा निवासी युवा किसान अक्षत देवरा ने मुहिम चला रखी है। अक्षत वनस्पति विज्ञान में स्नातक, टाटा एनर्जी रिसर्च इंस्टिट्यूट (नई दिल्ली) से वनस्पति जैवतकनिकी विज्ञान में स्नातकोत्तर है। उन्होंने नौकरी छोड़कर भूमि संरक्षण, मिट्टी बचाओ अभियान चला रखा है। साथ ही जैविक, औद्योनिक खेती कर रहे हैं।
उनका कहना है कि मिट्टी आवश्यक प्राकृतिक संसाधन है, जो सभी स्थलीय जीवन के लिए आधार का काम करती है। मिट्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा वर्तमान में की जाने वाली अनुपयुक्त कृषि तकनीक हैं। बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इन तकनीकों द्वारा मिट्टी के भीतर पोषक तत्वों और जैव विविधता के प्राकृतिक संतुलन को नुकसान पहुंच रहा है।
विशेष रूप से, एकल फसल कृषि, जहां एक ही फसल को बार-बार एक ही भूमि पर उगाया जाता है। मिट्टी से विशिष्ट पोषक तत्वों को खींच लेती है और कीटों, रोगाणुओं, और बीमारियों को पनपने का अवसर देती है।
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02सीटीके10-गोकर्ण पार्क में दो माह पूर्व लगाए गए झूले की महज बेल लटकते हुए। स्रोत : अमर उजाला
02सीटीके10-गोकर्ण पार्क में दो माह पूर्व लगाए गए झूले की महज बेल लटकते हुए। स्रोत : अमर उजाला
02सीटीके10-गोकर्ण पार्क में दो माह पूर्व लगाए गए झूले की महज बेल लटकते हुए। स्रोत : अमर उजाला