स्वतंत्रता संग्राम सैनानी स्व.. बाबू किशन सिंह। फाइल फोटो
- कई बार जेल गए और देश की स्वतंत्रता के लिए यातनाएं झेलीं
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सतीश शर्मा
धामपुर। उदयपुर निवासी स्व. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू किशन सिंह के आंदोलन को कभी नहीं भुलाया जा सकता। बाबू किशन सिंह 20 साल की आयु में महात्मा गांधी के आंदोलन में देश को आजादी दिलाने में सक्रिय हो गए थे। वह कई बार जेल गए और देश की स्वतंत्रता के लिए यातनाएं झेलीं।
19वीं शताब्दी के तीसरे दशक में महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन परवान चढ़ चुका था। शहर हो या गांव हर क्षेत्र से महिला और पुरुषों की टोलियां घर बार छोड़ गांधी जी के पीछे चल पड़ी थीं। उस दौर में सड़कों, यातायात की सुविधाएं न के बराबर होती थीं। उस दौर में जिले के अफजलगढ़ क्षेत्र के गांव उदयपुर निवासी बाबू किशन सिंह भी आंदोलन में सक्रिय हो गए थे। उस जमाने में गांव उदयपुर को काला पानी के रूप में जाना जाता था। क्योंकि यह गांव रामगंगा, खो, बनेली आदि नदियों को पार करके धामपुर तहसील क्षेत्र का सुदूर गांव है। इसी गांव के लाल सिंह के सुपुत्र बाबू किशन सिंह 20 वर्ष की उम्र में ही गांधी जी के आंदोलनों से जुड़ गए।
हाईस्कूल की शिक्षा पूर्ण कर बाबूजी अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ आंदोलन में पूरी तरह भाग लेने लगे थे। बाबू किशन सिंह को सन 1932 में सत्याग्रह करने के आरोप में मुरादाबाद जिला मजिस्ट्रेट ने छह महीने का कठोर कारावास, 30 रुपये अर्थदंड की सजा दी थी। जेल से रिहाई पर 1940 के बाद किशन सिंह ने गन्ना विभाग में सुपरवाइजर के पद पर नौकरी शुरू की। वह जीवन पर्यंत गन्ना विभाग में एक ईमानदार अधिकारी के रूप में जाने जाते रहे। बाबूजी का जन्म वर्ष 1909 में ग्राम उदयपुर में ही हुआ था। देहावसान साल 1996 में धामपुर में हुआ। इनके पांच पुत्रों में से साहित्यकार सत्यराज सबसे छोटे हैं। आजकल रानी बाग कॉलोनी धामपुर में अपने परिवार के साथ रहते हैं। सत्यराज ने बताया कि उनके परिवार के आठ सदस्यों ने एक साथ आजादी की लड़ाई में प्रतिभाग किया था। (संवाद)