गिद्धों का सुरक्षित ठिकाना बना अमानगढ़
बिजनौर। पर्यावरण के प्रहरी कहे जाने वाले गिद्ध आबादी क्षेत्रों से विलुप्त हो चुके हैं, लेकिन घने जंगल इनका सुरक्षित ठिकाना बनते जा रहे हैं। शनिवार को हुई एक दिवसीय गिद्ध गणना में जो तस्वीरें सामने आईं, वो पर्यावरण और पक्षी प्रेमियों को सुखद अहसास करा रही हैं। अमानगढ़ वन रेंज में हुई गणना में वन विभाग की टीम को 101 हिमालयन ग्रिफन गिद्ध दिखाई दिए। हालांकि पिछले साल हुई गणना में 141 गिद्ध दिखे थे, लेकिन वन विभाग का मानना है कि वन क्षेत्र बहुत बड़ा होने के कारण अलग-अलग जगहों पर गिद्ध घूमते रहते हैं। इनकी मौजूदगी ही पर्यावरण की शुद्धता का सूचक है।
दो दशक पहले ही गिद्धों की संख्या घटनी शुरू हो गई थी और आबादी क्षेत्रों से गिद्ध लगभग विलुप्त हो चुके हैं। इजिप्शियन गिद्ध ही इक्का दुक्का मिल जाते हैं। इस बीच अमानगढ़ से पर्यावरण और पक्षी प्रेमियों के लिए सुखद खबर है। वन विभाग ने शनिवार को अमानगढ़ वन रेंज में एक दिवसीय गणना कराई तो टीम को 101 गिद्ध दिखाई दिए। डीएफओ डॉ. अनिल पटेल ने बताया कि हमारी गणना के दौरान 101 हिमालयन ग्रिफन वल्चर दिखाई दिए हैं। हालांकि अमानगढ़ वन रेंज में संख्या की बात की जाए तो वह इससे कहीं ज्यादा होगी। क्योंकि ये एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते हैं। पिछली बार गणना के बाद 141 गिद्ध दिखाई दिए थे। अमानगढ़ में लगातार गिद्धों का दिखना पर्यावरण के लिए अच्छा संकेत है। अमानगढ़ में पालतू पशुओं की मौजूदगी नहीं है, यहां पर केवल वन्य जीवों के अवशेष ही गिद्ध खाते हैं। यह भी कारण है कि अमानगढ़ वन रेंज गिद्धों के लिए सुरक्षित ठिकाना है। (संवाद)
डाइक्लोफैनिक बना था गिद्धों का काल
यूं तो गिद्धों के विलुप्त होने के कई कारण हैं, लेकिन इनमें से सबसे बड़ा कारण डाइक्लोफैनिक के इस्तेमाल को माना जाता है। पशुओं में इस दवा के इस्तेमाल के यह समस्या बनता गया, क्योंकि मृत पशु का मांस खाने से यह दवा गिद्धों तक पहुंचने लगी। इसके दुष्प्रभाव से गिद्ध गर्दन का लकवा, लीवर समस्या से ग्रसित होने लगे और 1990 के दशक के बाद इनकी संख्या में गिरावट शुरू हो गई। जब तक इस दर्द निवारक डाइक्लोफैनिक पर प्रतिबंध लगता, बहुत देर हो चुकी थी और 90 से 95 प्रतिशत तक गिद्ध मर चुके थे। इसके बाद लॉन्ग बिल्डवल्चर, किंग वल्चर, वाइट रंपड वल्चर को आईयूसीएन की रेड लिस्ट में शामिल कर दिया गया। इसके अलावा ग्रिफन वल्चर, हिमालयन वल्चर एवं सिनेरियस वल्चर भी खतरे की सूची में शामिल हो गए।
इसलिए जरूरी है गिद्धों की मौजूदगी
डीएफओ बिजनौर डॉ. अनिल पटेल कहते हैं कि गिद्ध केवल मृत जानवरों का मांस ही खाते हैं। ऐसे में सड़कों के किनारे पड़े रहने वाले जानवरों के अवशेष सड़ने पर संक्रमण का खतरा कम हो जाता था, लेकिन अब यह अवशेष ऐसे ही पड़े रहते हैं, जिसे दूसरे जानवर खाकर बीमार पड़ जाते हैं। गिद्ध पर्यावरण में सफाईकर्मी का काम करते हैं। इनकी मौजूदगी पर्यावरण के लिए बेहद जरूरी है।
अमनागढ़ में बैठे गिद्ध।- फोटो : BIJNOR