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खुले आसमान में सर्द से ठिठुरती मुफलिसी

Wed, 29 Oct 2014 05:32 AM IST
Bijnor
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बिजनौर/मंडावर। खादर क्षेत्र में बाढ़ सड़क से लेकर विधानसभा और संसद तक मुद्दा बन चुकी है। ऐसा कोई चुनाव नहीं हुआ, जिसमें बाढ़ मुद्दा न रही हो। बाढ़ को सियासी हथियार बनाकर दावेदार एक दूसरे पर हमला करते हैं और वोट भी झटकते हैं। हैरत की बात ये है कि बाढ़ का शोर मचाकर वोट झटकने के खेल में बाढ़ पीड़ित ही हाशिए पर हैं। दो साल पहले बाढ़ से जिन गरीब परिवारों के आशियाने गंगा में समाये, उनकी सुध लेने के लिए न तो कोई नेता ही पहुंचा और न ही कोई जनप्रतिनिधि। 61 परिवार दो साल से खुले आसमान के नीचे रहे हैं। सर्दी शुरू हो गई है। गंगा के किनारे शीतलहर का हर झोंका इन गरीब परिवाराें को मुफलिसी के दर्द का एहसास करा रहा है। तिरपाल के छेद से पास होकर छोटे-छोटे बच्चों के सीने से टकराने वाली सर्द हवा से बच्चों को निमोनिया जैसी बीमारियां हो रही हैं। इन परिवारों के लिए हर पल किसी सजा से कम नहीं है।
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तटीय गांवों में खुद ही तोड़े थे बाढ़ पीड़ितों ने मकान
गंगा के तटीय गांव सीमला कला, सीमली व फतेहपुरसभाचंद में कई साल से बाढ़ आ रही है। गंगा की धारा से भूमि कटान जारी है। ये गांव गंगा में समा चुके हैं। ग्रामीण अपने घर तोड़कर उसका मलबा साथ ले गए। इन्हें मकान बनाने के लिए जगह-जगह सौ वर्ग फिट जमीन दी गई है। मकान के लिए कुछ परिवारों को इंदिरा आवास के चेक भी मिले, लेकि न 61 परिवार ऐसे हैं, जिन्हें फूटी कौड़ी भी नहीं मिली है। ये परिवार गांव के बाहर खुले आसमान के नीचे रह रहे हैं। आरएसएस व अन्य सामाजिक संगठनों की ओर से इन परिवारों को तिरपाल वितरित किए गए थे। अब ये तिरपाल भी फट चुके हैं। मुआवजा व चैक पाने से वंचित फतेहपुर के बाढ़ पीड़ित श्रवण कुमार, मांगेराम, दिग्विजय, झड़िया, शिवकुमार, राजेंद्र सिंह, रामकुमार, रामसिंह, तारे सिंह, ब्रह्मपाल, श्यामलाल, बाबू समेत 61 परिवारों का कहना है कि प्रशासन से भी कई बार मदद के लिए गुहार लगा चुके हैं। जनप्रतिनिधियों के सामने भी दुखड़ा रोया, लेकिन किसी ने मदद नहीं की।
कश्मीर की तरह उजड़े गांवों को बसाने के लिए कोई नहीं गंभीर
जम्मू-कश्मीर में बाढ़ आई। गांव व शहर तबाह हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहां का दौरा किया और एक हजार करोड़ रुपये का पैकेज देने की घोषणा की, लेकिन बिजनौर में उजड़े तटीय गांवाें के लोगों की किसी को फिक्र नहीं है। फतेहपुर सभाचंद के ग्रामीण श्रवण कुमार बताते हैं कि काश, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई नुमाइंदा तटीय गांवों के उजड़े ग्रामीणों का हाल भी जान पाता तो उन्हें मय परिवार सर्द मौसम में खुले आसमान के नीचे बैठकर मुफिलिसी के दर्द से कराहना न पड़ता।
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