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गन्ने से ज्यादा मुनाफा देगी अमरूद की फसल

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गन्ने से ज्यादा मुनाफा देगी अमरूद की खेती
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बिजनौर। गन्ने से किसानों का मोहभंग करने के लिए अब उद्यान विभाग किसानों को बागवानी के लिए प्रेरित करेगा। अमरूद की खेती किसानों को गन्ने से भी ज्यादा लाभ दे सकती है। उद्यान विभाग को पहली बार शासन की ओर से 20 हेक्टेयर जमीन में अमरूद बोने का लक्ष्य दिया गया था। अमरूद की खेती अब परंपरागत के बजाए सघन पद्धति से कराई जाएगी। इससे किसानों को मोटा मुनाफा होगा। अमरूद की नई प्रजाति श्वेता, ललित, पंत प्रभात व हिसार सफेदा किसानों को मालामाल करेंगे।
जिले के किसानों ने गन्ना उत्पादन में रिकॉर्ड कायम कर दिए हैं। गन्ने से किसानों ने बंपर पैदावार करके बंपर कमाई की है, लेकिन बंपर पैदावार के किसान मिलों और किसानों दोनों को ही झेलने पड़ रहे हैं। चीनी के दाम धड़ाम हो चुके हैं और किसानों को भुगतान के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है। चीनी मिलों को भी चीनी बेचने के लिए पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। शासन की मंशा है कि किसानों को दूसरी फसलों विशेषकर बागवानी की ओर प्रेरित किया जाए। इसके लिए शासन ने पहली बार जिले में केले, अमरूद आदि की बागवानी के लिए प्रेरित करने का निर्णय लिया है। जिले में कई साल के बाद अमरूद की बागवानी कराने के लिए सब्सिडी की व्यवस्था की गई है। शासन ने जिले में 20 हेक्टेयर जमीन में अमरूद बोने का लक्ष्य दिया था, जिले उद्यान विभाग ने पूरा कर लिया है। किसानों को सघन खेती से बागवानी कराई जा रही है। इसमें फायदा पहले से ज्यादा होगा।
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लगते हैं ज्यादा पेड़
परंपरागत बागवानी में एक हेक्टेयर जमीन में 278 पेड़ लगाए जाते थे। पेड़ की लाइन और आपस में छह मीटर तक का अंतर होता था। नई प्रजाति में अमरूद की लाइन से लाइन की दूरी तीन मीटर तथा आपस में दूरी दो मीटर भी रखी जा रही है। इस पद्धति से एक हेक्टेयर जमीन में 1667 तक पेड़ लगाए जा सकते हैं।

मुनाफे का गणित
परंपरागत खेती में एक पेड़ पर एक क्विंटल तक अमरूद आ जाता है। यानि एक हेक्टेयर जमीन में 278 क्विंटल तक माल निकल सकता है, जबकि सघन पद्धति में 555 क्विंटल से 833 क्विंटल तक माल निकलता है। इससे किसानों का मुनाफा बहुत बढ़ जाता है।

यह है सघन पद्धति
परंपरागत बागवानी में अमरूद के पेड़ की छंटाई नहीं होती। पेड़ बढ़ने पर जड़ों से लिया जाने वाला पोषण पूरे पेड़ में बंटता है और फल का आकार धीरे-धीरे बहुत घट जाता है। सघन पद्धति में पेड़ की छंटाई होती रहती है। इससे जड़ द्वारा दिया गया पोषण कम हिस्सों में जाता है। इससे फल का आकार सदैव एक सा रहता है।

अमरूद के बाग के लिए था जिले का नाम
जिले में पहले अमरूद की के बाग बड़े पैमाने पर थे। झालू में लाला रोशनलाल के अमरूद के बाग सैकड़ों बीघा जमीन में थे। बिजनौर आने वाले ट्रैक पर रेलवे क्रासिंग के दोनों ओर उनके बाग थे। इसके अलावा रेतीले जंगल में भी अमरूद की खेती बहुत मुफीद मानी जाती थी।

वैज्ञानिक प्रजाति तैयार
अमरूद की नई प्रजाति वैज्ञानिकों ने विकसित की हैं। अमरूद की श्वेता, ललित, पंत प्रभात व हिसार सफेदा बंपर पैदावार देते हैं। इनका एक अमरूद 400 ग्राम तक वजन का रहता है।

यह है कीमत
एक बीघा जमीन में औसतन अमरूद और गन्ना 60 क्विंटल तक निकलते हैं। किसान का गन्ना 3.25 रुपये प्रति क्विंटल तथा अमरूद 50 रुपये प्रति क्विंटल तक बिकता है। इससे आमदनी का अंदाजा किसान खुद लगा सकते हैं।
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शुरू किया अभियान
जिला उद्यान अधिकारी नरपाल मलिक के अनुसार किसानों को बागवानी की ओर फिर से मोड़ा जा रहा है। जिले में 20 हेक्टेयर जमीन में अमरूद लगवा दिए गए हैं। इसकी एक पौध 39 रुपये की मिलती है। किसान निजी स्तर पर भी बागवानी कर लाभ कमा सकते हैं।
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