बिजनौर। निकाय चुनाव में भाजपा को टिकट बंटवारे का खामियाजा भुगतना पड़ा। गलत टिकट देने की वजह से भाजपा की चुनाव में खूब किरकिरी हुई। टिकटों की वजह से नेता ही नहीं वोटर भी भाजपा से नाराज हो गए और चुनाव में दूसरे प्रत्याशियों के साथ जा खड़े हुए।
बिजनौर नगर पालिका से भाजपा ने पुराने चेहरों को नजरअंदाज करके जिला बार के पूर्व अध्यक्ष एसके बबली की पत्नी नीता अग्रवाल पर दांव खेला था। भाजपा का यह दांव उल्टा पड़ गया। टिकटों के दावेदारों के साथ आरएसएस के नेता भी इस टिकट को देने से खफा हो गए। सब ने लामबंद होकर नीता अग्रवाल की मुखालफत शुरू कर दी। उनके खिलाफ चुनावी माहौल बनाना शुरू कर दिया। ऐसे भी लोग रहे जो चुनाव में तो चेहरा दिखाने को नीता अग्रवाल के साथ रहे पर भीतरघात करते रहे। चुनाव में नीता अग्रवाल के पति एसके बबली का मुस्लिम इलाके में जाकर वोट मांगना हिंदुओं को नागवार गुजरा था। यही वजह रही कि चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। भाजपा के कई कट्टर नेता तो वोट डालने तक नहीं गए और घरों में ही बैठे रहे। नगर पंचायत झालू से संजीव राणा भाजपा का टिकट मांग रहे थे। संजीव राणा को टिकट न देकर नरेंद्र सिंह को टिकट दे दिया गया। नरेंद्र सिंह लोगों के लिए नया चेहरा थे। वह लंबे अरसे बाद नौकरी से अपने घर लौटे थे। नरेंद्र सिंह को टिकट देने से भाजपा का वोट नाराज हो गया और वह निदर्लीय प्रत्याशी संजीव राणा से जुड़ गया। टिकट बंटवारे की वजह से भाजपा प्रत्याशी नरेंद्र सिंह को करारी हार का सामना करना पड़ा। चांदपुर नगर पालिका में भी भाजपा ने कई पुराने दिग्गजों को नजर अंदाज करके नीरू अग्रवाल को टिकट दे दिया। यहां भी टिकट का विरोध शुरू हो गया। बड़ी मुश्किल से भाजपा प्रत्याशी वोटरों को अपने से जोडने में जुटी रहीं। पर उन्हें पूरी तरह सफलता नहीं मिलीं। इसके अलावा भी जिले में कई जगह भाजपा को टिकट बंटवारे का खामियाजा भुगतना पड़ा। धामपुर नगर पालिका में राजू गुप्ता को भी टिकट देने का विरोध हुआ, पर राजू गुप्ता अपनी छवि की वजह से चुनाव जीत गए।
सभासद पद के लिए भाजपा का टिकट पुराने नेता मांग रहे थे। लेकिन इनकी भी अनदेेखी की गई। बिजनौर नगर पालिका से नगर अध्यक्ष नीरज शर्मा कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर खुद पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़े। पर कार्यकर्ताओं ने उनको नकार दिया। नीरज शर्मा 83 वोट से चुनाव हार गए। हिंदू युवा ावाहिनी जिलाध्यक्ष नीरज विश्नोई भाजपा का सिंबल होने के बाद भी अपनी पत्नी को चुनाव नहीं जीता सके। उनकी पत्नी शिवानी विश्नोई वार्ड 15 से चुनाव मैदान में थीं। उनको भी निर्दलीय प्रत्याशी से हार का सामना करना पड़ा। दोनों पदाधिकारियों के खुद टिकट लेकर चुनाव लड़ने से कार्यकर्ता खुश नहीं थे। कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर खुद चुनाव लड़ना इनको भारी पड़ा।