फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पेस्टीसाइड से मर रहीं मधुमक्खियां, घटा शहर का उत्पादन

विज्ञापन
विज्ञापन
पेस्टीसाइड से मर रहीं मधुमक्खियां, घटा शहर का उत्पादन
विज्ञापन

बिजनौर। भीषण गर्मी और पेस्टीसाइड का अंधाधुंध इस्तेमाल शहद उत्पादक किसानों के लिए घाटे की वजह बन गया। पेस्टीसाइड से जंगल में हजारों की संख्या में मधुमक्खियां मर गईं, वहीं गर्मी के कारण हरी पत्ती और फूल आदि उपलब्ध न होने से शहर का उत्पादन घटकर आधे से भी कम रह गया। ऊपर से बाजार में शहद के दाम भी लगातार गिर रहे हैं।
जिले में करीब पांच हजार मधुमक्खी पालक हैं। पिछले कई सालों से मधुमक्खी पालकों को शहद से अच्छी कमाई हो रही थी। लेकिन इस बार शहद का उत्पादन बेहद कम होने से मधुमक्खी पालक परेशान हैं। मधुमक्खी पालक रात दिन जंगल में खेतों पर रखे मधुमक्खी के डिब्बों की रखवाली करते हैं, रोजना मधुमक्खी को चीनी और अन्य सामान खिलाते हैं, ताकि शहद का उत्पादन अच्छा हो, लेकिन इस बार सभी प्रयास बेकार साबित हुए। मधुमक्खी पालक शहद के उत्पादन में गिरावट की वजह भीषण गर्मी और खेतों में पेस्टीसाइड के अंधाधुंध इस्तेमाल को मान रहे हैं।
विज्ञापन

पेस्टीसाइड के इस्तेमाल से बड़ी तादात कें मधुमक्खी मर रही हैं। झालू निवासी मधुमक्खी पालक विनीत कुमार, रामऔतार, सुरेश, यूनुस, गांव नागंल जट निवासी राजीव कुमार, वीरपाल सिंह, गांव तकीपुरा निवासी बिट्टू के मुताबिक वह कई साल से शहद के कारोबार को कर रहे हैं। शहद का उत्पादन इस बार जितना गिरा है, उतना कभी नहीं गिरा है। मधुमक्खी पालने के एक डिब्बे से छह माह में पालक चार डिब्बे बना लेते थे। चार डिब्बो में 80 किलो शहद तैयार होता था। जो इस बार केवल 20 किलो ही हुआ है। ये भी मान रहे हैं कि खेतों में पेस्टीसाइड के इस्तेमाल के साथ प्राकृतिक मार की वजह से शहद का उत्पादन गिरा है।

12 महीने होता है शहद का उत्पादन
मधुमक्खी पालकों के मुताबिक 12 महीने शहद का उत्पादन होता है। पर इस बार शहद डिब्बों में बन ही नहीं पाया। मधुमक्खी को मंहगी चीनी खिलानी पड़ रही है। उनका कहना है कि पिछले साल उन्होंने 144 रुपये किलो शहद बेचा था। इस बार केवल 80 रुपये किलो शहद बिका है। शहद खरीदने वाली कंपनी आपस में मिल गई हैं। एक व्यक्ति को शहद पालकों से खरीदने के लिए अधिकृत कर दिया है। यह व्यक्ति ही मनमाने दामों में शहद खरीद रहा है।
विज्ञापन


आगे मधुमक्खी के मरने की और उम्मीद : के के सिंह
कृषि विज्ञान केंद्र नगीना के वैज्ञानिक डॉ. के के सिंह के मुताबिक इस बार गर्मी ज्यादा होने और जमीनों में पेस्टीसाइड के इस्तेमाल से शहद का उत्पादन गिरा है। गर्मी में पौधे पर लगा फूल मुरझा जाता है। फूल से मधुमक्खी शहद नहीं ले पाती है। जमीन में हो रहे पेस्टीसाइड के इस्तेमाल से भी बड़ी तादाद में मधुमक्खी मर रही हैं। मधुमक्खी पालक जंगल में खेतों में ही मधुमक्खी के डिब्बों को रखे रहते हैं। इन दोनों वजह से शहद का उत्पादन गिरता जा रहा है, आने वाले समय में मधुमक्खी के और ज्यादा मरने की उम्मीद है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें