धामपुर। धामपुर में होली का इतिहास करीब 77 साल पुराना है। जो ब्रज, बरसाना की होली के बाद उत्तरी भारत में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां पर रंग की एकादशी के जुलूस के साथ गीला रंग शुरू होता है, जो दुल्हैंडी तक जमकर चलता है। इस दौरान चारों ओर हौ-हल्ला रहता है। जो जहां, जिधर दिखता है, हुलियारे दौड़-दौड़ कर उसी को रंग में सराबोर करते हैं।
आदर्श होली हवन समिति के संरक्षक डॉ. शंकर लाल शर्मा, जितेंद्र शर्मा बबलू, जयवीर सिसौदिया, संयोजक अनिल शर्मा एडवोकेट, अध्यक्ष रवि चौधरी, महामंत्री शेखर अग्रवाल, पवन अग्रवाल, वैशाख नंदन विश्वविद्यालय महामूर्ख सम्मेलन के संरक्षक अरुण शर्मा अरूण, हरिकांत शर्मा आदि का कहना है कि धामपुर की होली का इतिहास उनकी याद से पुराना है। 1940 से पहले होली के त्योहार को लोग अपने घरों में मनाते थे। होरी महाराज के मंदिर से जुलूस निकलता था। जिसमें बच्चा-बच्चा शामिल होता था। तब लोग कालातेल, मलमूत्र और कीचड़ से विचित्र प्रकार की होली खेलते थे। 1952 में सभी के आपसी सहयोग से यहां पर वृहद स्तर पर रंग एकादशी हवन जुलूस, होली हवन और गीले रंग की अलग अलग गाड़ियों से निकाला शुरू किया। होली हवन जुलूस का शुभारंभ स्व. विनोद शर्मा आढ़ती के मकान के किनारे से और रंग जुलूस का प्रारंभ मंदिर बजरिया ठाकुरद्वारा से होना शुरू हुआ। जो अब तक कायम है।
जग्गू महाराज के संरक्षण में निकला पहला जुलूस
नगर में फाल्गुन शुक्ल एकादशी, रंग एकादशी के दिन मंदिर ठाकुरद्वारा बजरिया से निकलने वाला रंग जुलूस नगर की देन है। बजरिया के प्रथम उस्ताद स्व. जग्गू महाराज की 1952 में महाराज जी के संरक्षण में उनके सहयोगियों ने इस रंग एकादशी जुलूस की परंपरा को शुरू किया था। उस समय एक बैलगाड़ी पर ड्रम में रंग भरकर पिचकारियों से हुलियारे सभी को सराबोर करते चलते थे। जुलूस में कई युवक नीली घोड़ी बनकर ढोल की थाप पर जमकर नाचते थे और अन्य लोगों का भी उत्साहवर्धन करते चलते थे। इस भागीदारी में परंपरा को आगे बढ़ाने में स्व. गंगाराम पुजारी, पं. फकीरचंद , पंडित कांता प्रसाद हलवाई, बाबूराम शर्मा ठेकेदार, छोटेलाल ठेकेदार, रमेश चंद सिघल, बाबूराम सराफ , विष्णु स्वरूप, जय प्रकाश शर्मा जूते वाले, राजेश्वर प्रसाद शर्मा चक्कीवाले , रतनलाल, बाबूराम होटल वाले, बलराम , नन्हेंमल, शांति प्रसाद माहेश्वरी, गिरीश चंद उस्ताद, इंदर सिंह, टेलर मास्टर बाबूराम, फोटोग्राफर बाबूराम बताशे वाले, देवेंद्र कुमार, धर्मप्रकाश बंसल, देवकीनंदन बिजली वाले, राधेलाल नंबरदार, हरस्वरूप पनवाड़ी, चंद्रहास शर्मा, विनोद क़ुमार जैन, महावीर प्रसाद वर्मा, रामकिशन बूरे वाले, अवतार शर्मा का अविस्मरणीय योगदान रहा। वर्तमान में इस परंपरा को शुरू करने वाली टीम में बुजुर्ग कैलाश चंद कात्यायन व विवेक कात्यायन योगदान दे रहे हैं।
बैलगाड़ी से ट्रैक्टर-ट्रालियों पर आ गए रंग के ड्रम
कैलाश चंद कात्यायन बताते है कि वर्ष 1952 में शुरू जुलूस का संचालन अब युवाओं के हाथों में है। उनके कुशल संचालन में ट्रैक्टर ट्रॉलियों पर बड़ी फब्बारों और झांकियों के साथ जुलूस निकलता है। विभिन्न चौराहों पर खेले जाना वाला रंग देखते ही बनता है। वर्तमान में इस जुलूस के अध्यक्ष विभु बंसल, पवन अग्रवाल, दिनेशचंद अग्रवाल नवीन, नितिन अग्रवाल, पप्पू चौहान, अनिल अग्रवाल कटका , दीपक अग्रवाल , देवेंद्र रस्तौगी, अंकित अग्रवाल, लाजपतराय मुखिया , पिंटू, पंकज अग्रवाल, अजय शर्मा आदि के संयोजन में मंदिर ठाकुरद्वारा बजरिया से शुरू होकर परंपरागत मार्गों से निकलता है और मंदिर पर जाकर ही संपन्न होता है।
हवन जुलूस समाप्त होने तक शुरू नहीं होता गीला रंग
हवन जुलूस समाप्त होने तक गीला रंग शुरू नहीं होता। गीले और सूखे रंग का मार्ग लगभग एक है, फिर भी कहीं दोनों समितियां और समुदाय में कहीं कोई भेद विभेद देखने को नहीं मिलता। अर्थात आदर्श होली हवन समिति धामपुर के बैनर तले गीले और सूखे रंग का संचालन अपनी अनौखी छठा बरसाता है। लगता है कि जैसे धामपुर में दूसरा नंदगांव बरसाना आ गया है।