- भारत छोड़ो आंदोलन में बिजनौर का सबसे बड़ा जनप्रदर्शन
संवाद न्यूज एजेंसी
नूरपुर। भारत छोड़ो आंदोलन के तहत 16 अगस्त 1942 को करीब 15 हजार लोगों ने नूरपुर थाने का घेराव करते हुए तिरंगा फहरा दिया था। हालांकि पुलिस की गोली से परवीन सिंह और रिक्खी सिंह शहीद हुए जबकि 10 लोग घायल हुए थे। 32 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया। प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों पर छह हजार रुपये का सामूहिक जुर्माना भी लगाया।
महात्मा गांधी के करो या मरो के आह्वान ने बिजनौर के क्रांतिकारियों में ऐसी लौ जगाई कि अंग्रेजी हुकूमत के दमनचक्र के बावजूद हजारों लोग तिरंगा फहराने के लिए थाने पर टूट पड़े। इससे पहले 11 अगस्त 1942 को नूरपुर क्षेत्र के वीरों ने एक गुप्त बैठक में तय किया कि 16 अगस्त को नूरपुर थाने पर तिरंगा फहराया जाएगा। तीन दिशाओं से तीन जत्थे, फीना से क्षेत्रपाल सिंह के नेतृत्व में, दूसरा गोहावर से परवीन सिंह, रिक्खी सिंह और नारायण सिंह के नेतृत्व में और तीसरा ताजपुर से डॉ. राजकुमार के नेतृत्व में नूरपुर की ओर बढ़े।
पुलिस ने लाठीचार्ज कर रोकने का प्रयास किया, परंतु 15 हजार से अधिक लोगों का सैलाब थाने तक पहुंच गया। ताजपुर के डॉ. राजकुमार और नूरपुर के वैद्य जगनंदन प्रसाद ने थानेदार से शांतिपूर्ण झंडारोहण की विनती की, मगर जवाब मिला, नहीं। इसके बाद लाठियों की बौछार और गोलियों की गड़गड़ाहट गूंजी।
गांव गुनियाखेड़ी के परवीन सिंह तिरंगा थामे ही शहीद हो गए। अस्करीपुर के रिक्खी सिंह जेल अस्पताल में वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि ढेला अहीर के मुंशीराम गोली लगने से घायल होकर गिरफ्तार कर लिए गए।
इस घटना में 32 सेनानियों को कैद किया गया और 6,000 रुपये का सामूहिक जुर्माना लगाया गया। लोअर कोर्ट ने छह-छह वर्ष की सजा सुनाई, पर अपील में कुछ को दो वर्ष की सजा रह गई। अप्रैल 1944 में हाईकोर्ट के आदेश से सभी की रिहाई हुई।
आज जिस स्थान पर परवीन सिंह और रिक्खी सिंह ने प्राणों की आहुति दी थी, वहां स्मारक खड़ा है। हर साल 16 अगस्त को वहां मेले का आयोजन होता है, जहां क्षेत्र की जनता अपने वीरों को नमन करती है।