किसानों को पूसा मसूर अगेती प्रजाति करेगी मालामाल
बिजनौर। किसानों को दलहनी फसल से जोड़कर कम समय में आय दोगुनी करने के लिए प्रयास शुरू हो गए हैं। नगीना स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में कम समय में तैयार होने वाली मसूर दाल की प्रजाति पूसा मसूर अगेती बोई गई है। किसानों को इसके बारे में बताया जा रहा है। अगले साल इसका बीज किसानों को बड़े पैमाने पर दिया जाएगा।
गन्ने की फसल की कटाई किसान अक्तूबर से शुरू कर देते हैं। जो खेत नवंबर तक खाली होते हैं, कई बार उनमें गेहूं की फसल नहीं बोई जा पाती है। जिले के किसान कम संख्या में ही दलहन की खेती करते हैं। इसकी वजह रहता है दलहन की फसल का तैयार होने में ज्यादा समय लेना। दलहनी फसल को कम समय में तैयार करने के लिए कृषि वैज्ञानिक अनेक प्रजाति विकसित कर रहे हैं। मसूर दल की कम समय में तैयार होने वाली प्रजाति पूसा मसूर अगेती प्रजाति विकसित की है। जिले के कृषि विज्ञान केंद्र को भी इसका बीज बोने के लिए गया था। जिले में मसूर की फसल खड़ी है। किसानों को प्रजाति की खासियत आदि के बारे में केंद्र में ले जाकर बताया जा रहा है। यह 13 क्विंटल प्रति हेक्टेअर तक की उपज देती है। इस प्रजाति में आयरन की मात्रा सामान्य प्रजाति से अधिक होती है।
यह है खासियत
साधारण मसूर केवल नवंबर में बोई जाती है और 130 दिन तक में तैयार होती है। पूसा मसूर अगेती नवंबर तक बोई जा सकती है। इस प्रजाति की फसल 100 दिन में ही तैयार हो जाती है।
यह है दलहनी फसल का फायदा
दलहनी फसल की जड़ में राइजोबियम पदार्थ की गांठ होती हैं। यह गांठ पर्यावरण में मौजूद ऑक्सीजन को खेत में मिलाती है। इससे किसान की जमीन बहुत उपजाऊ हो जाती है। अगर किसी खेत में लगातार दो तीन साल तक दलहनी फसल बोई जाएं तो उसमें केमिकलयुक्त खाद नहीं डालना होगा।
सहफसली खेती से बढ़ाएं आमदनी
कृषि विज्ञान केंद्र के पादप प्रजनन से जुड़े कृषि वैज्ञानिक डा.केके सिंह के अनुसार दलहनी फसल किसान ट्रैंच विधि से बोए शदर कालीन गन्ने में भी बो सकते हैं। दहलनी फसल से किसान अच्छी आमदनी कर सकते हैं। किसानों को दलहनी फसल से जोड़ने के पूरे प्रयास किए जा रहे हैं।