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संतोष आर्य ने जगाई बालिका शिक्षा की अलख

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संतोष आर्य ने जगाई बालिका शिक्षा की अलख
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बरुकी। बालिकाओं के सामने शिक्षा ग्रहण करने के दौरान वाली समस्याओं को दूर करने के लिए संतोष कुमारी आर्य ने गांव देहात में स्कूल खोले और अभिभावकों को बेटियों की पढ़ाई के प्रति जागरूक किया। आज भी वह 250 से अधिक बालिकाओं को निशुल्क शिक्षा प्रदान करा रही हैं।
संतोष कुमारी आर्य का जन्म बुलंदशहर जनपद के मुंडाखेड़ा गांव में हुआ। उन्हें बचपन से ही पढ़ने का शौक था, लेकिन गांव में मात्र कक्षा आठ तक की शिक्षा के लिए ही विद्यालय था। कक्षा आठ तक पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें परिजनों ने लड़की होने के कारण गांव से बाहर पढ़ने के लिए नहीं भेजा। संतोष भी परिजनों की परेशानी समझती थी, इसलिए उन्होंने कोई जिद नहीं की। 1974 में उनका विवाह गौतमबुद्धनगर जनपद के पारसौल गांव निवासी विद्यानंद के साथ हुआ। विवाह के बाद संतोष कुमारी ने पति के समक्ष पढ़ने की इच्छा रखी। उनके पति विद्यानंद ने उनका सहयोग किया। उन्हें व्यक्तिगत छात्रा के तौर पर पढ़ने के लिए प्रेरित किया। व्यक्तिगत छात्रा के तौर पर पढ़ते हुए संतोष कुमारी ने हाई स्कूल, इंटरमीडिएट, स्नातक और उसके बाद हिंदी और संस्कृत दोनों विषयों से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने बनारस संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री की डिग्री ली और रोहतक विश्वविद्यालय से बीएड किया। उन्होंने कामकाजी महिलाओं को भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया।
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1978 में खोला कक्षा आठ तक का पहला विद्यालय
संतोष अपने पति के साथ 1978 में बरूकी गांव में आ गईं। यहां चकबंदी में छूटी जगह पर उन्होंने कक्षा आठ तक का एक विद्यालय स्थापित किया। उनका प्रयास लड़कियों को उच्च शिक्षा दिलाना और ग्रामीण क्षेत्र के गरीब और वंचित बच्चों को शिक्षा दिलाना था। उनके द्वारा स्थापित विद्यानंद जूनियर हाई स्कूल 2009 में उत्तर माध्यमिक विद्यालय बन गया और 2015 में इस विद्यालय को इंटरमीडिएट की मान्यता मिली। संतोष कुमारी सामाजिक क्षेत्र में भी कार्य करती रहीं। 1995 में उन्होंने अपने ससुराल के गांव भट्टा पारसौल से ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उन्होंने गांव में ढेरों विकास कार्य कराए और दस वर्ष तक गांव की प्रधान रहीं। इसी दौरान महिलाओं के चार समूह बनाकर उन्होंने उन्हें आर्थिक रूप से निर्भर होने के लिए प्रेरत किया। वर्तमान में वह ग्राम बरुकी स्थित विद्यानंद इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य हैं। विद्यालय में एक हजार से भी अधिक छात्र-छात्राएं शिक्षा ग्रहण करते हैं। वह गरीब एवं आर्थिक रूप से कमजोर छात्र-छात्राओं को निशुल्क शिक्षा प्रदान करती हैं। विद्यालय में लगभग 250 छात्र-छात्राएं निशुल्क शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
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